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Sunday, February 20, 2011

पाठशाला

चिड़िया ने दिया क़ीमती सबक़

किसान ने एक दिन छोटी-सी चिड़िया पकड़ ली। वह इतनी छोटी थी कि किसान की एक मुट्ठी में दो चिड़ियां समा सकती थीं। किसान कहने लगा कि वह उसे पकाकर खा जाएगा। चिड़िया बोली, ‘कृपा करके मुझे छोड़ दो। वैसे भी मैं इतनी छोटी हूं कि तुम्हारे एक कौर के बराबर भी नहीं होऊंगी।’

किसान ने जवाब दिया, ‘लेकिन तुम्हारा मांस बहुत स्वादिष्ट होता है। और हां, मैंने कहावत सुनी है कि कुछ नहीं से कुछ भी होना बेहतर है।’ उसकी बात सुनकर चिड़िया बोली, ‘अगर मैं तुम्हें ऐसा मोती देने का वादा करूं, जो शुतुरमुर्ग के अंडे से भी बड़ा हो, तो क्या तुम मुझे आÊाद कर दोगे?’ उसकी बात सुनकर किसान बहुत ख़ुश हो गया और तत्काल उसने मुट्ठी खोलकर उसे उड़ा दिया।
चिड़िया आÊाद होते ही कुछ दूर पर एक पेड़ की थोड़ी ऊंची डाल पर जा बैठी, जहां तक किसान का हाथ नहीं पहुंच पाता था। किसान ने उसे बैठा देखकर बड़ी बेसब्री से कहा, ‘जाओ, जल्दी जाओ, मेरे लिए वह मोती लेकर आओ।’ चिड़िया हंसकर बोली, ‘वह मोती तो मुझसे भी बड़ा है, मैं उसे कैसे ला सकती हूं?’ किसान ने ग़ुस्से और खीझ से कहा, ‘तुम्हें लाना ही पड़ेगा, तुमने वादा किया है।’
चिड़िया वहीं बैठी रही। उसने जवाब दिया, ‘मैंने तुमसे कोई वादा नहीं किया था। मैंने सिर्फ़ यही कहा था कि अगर मैं ऐसा वादा करूं, तो क्या तुम मुझे छोड़ दोगे। और इतना सुनते ही तुम लालच में अंधे हो गए थे। ’ उसकी बात सुनकर किसान हाथ मलने लगा। चिड़िया बोली, ‘लेकिन दुखी मत हो, मैंने आज तुम्हें वह पाठ पढ़ाया है, जो ऐसे हÊार मोतियों से Êयादा क़ीमती है। हमेशा कुछ भी करने से पहले सोच-विचार करो।’

भगवान से कैसे बात करें हम..

दादाजी बैठे-बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। कमरे में उनकी पांच वर्षीय पोती भगवान के सामने हाथ जोड़े बैठी कुछ बुदबुदा रही थी। नन्ही पोती को इस तरह प्रार्थना करते देख दादाजी को सुखद आश्चर्य हुआ। सो, वे ध्यान से सुनने लगे कि पोती आख़िर भगवान से क्या कह रही है। लेकिन काफ़ी ध्यान लगाने पर भी उन्हें कुछ समझ में न आया।

उनकी पोती शब्द या वाक्य बोलने की बजाय क, ख, ग, घ, अ, आ, इ, ई, उ ऊ जैसे अक्षर दुहरा रही थी। उन्होंने पूछा, ‘बिटिया, तुम क्या कर रही हो?’ पोती बोली, ‘मैं प्रार्थना कर रही हूं दादाजी। मुझे सटीक शब्द नहीं सूझ रहे हैं, इसलिए मैं अक्षर बोल रही हूं। भगवान उन अक्षरों को चुनकर सटीक शब्द बना लेगा, क्योंकि वह जानता है कि मैं क्या चाहती हूं।’
कहीं, किसी और जगह, एक और दादाजी अपने पोते की प्रार्थना सुन रहे थे। यह पोता भी बहुत छोटा था। इतना छोटा कि उसके पास बुद्धि तो थी, पर स्वार्थ न था। वह भगवान की शक्ति के बारे में तो जानता था, पर यह नहीं जानता था कि भगवान से डरना चाहिए या नहीं।
दादा ने सुना, पोता कह रहा था, ‘हे भगवान, मेरे पापा की रक्षा करना और मेरी मम्मी की भी और मेरी बहन की और मेरे भाई की और मेरे दादा-दादी की भी रक्षा करना। तू मेरे सभी दोस्तों को अच्छे से रखना और पड़ोस वाले अंकल-आंटी को भी।
आया और उसके छोटू की देखभाल की जिम्मेदारी भी तेरी है। और हां, तुझे मेरे कुत्ते की भी अच्छी तरह देखभाल करनी है। और हां भगवान, ध्यान से अपनी भी देखभाल करते रहना। अगर तुझे कुछ हो गया, तो हम सब बहुत मुसीबत में फंस जाएंगे!’

भिखारी का धर्म-संकट

एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज तो मेरी झोली शाम से पहले ही भर जाएगी। वह कुछ दूर ही चला था कि अचानक सामने से उसे राजा की सवारी आती दिखाई दी। भिखारी ख़ुश हो गया।

उसने सोचा, राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारी ग़रीबी दूर हो जाएगी। जैसे ही राजा भिखारी के निकट आया, उसने अपना रथ रुकवाया। लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले, अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।
ख़ैर, भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला और जैसे-तैसे कर उसने जौ के दो दाने निकाले और राजा की चादर पर डाल दिए। राजा चला गया। भिखारी मन-मसोसकर आगे चल दिया। उस दिन उसे और दिनों से ज्यादा भीख मिली थी, फिर भी उसे ख़ुशी नहीं हो रही थी।
दरअसल, उसे राजा को दो दाने भीख देने का मलाल था। बहरहाल, शाम को घर आकर जब उसने झोली पलटी, तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। उसके झोले में दो दाने सोने के हो गए थे। वह समझ गया कि यह दान की महिमा के कारण हुआ था। बहरहाल, उसे बेहद पछतावा हुआ कि काश! राजा को और जौ दान करता।
सबक अवसर ऐसे ही लुके-छिपे ढंग से सामने आते हैं। समय रहते व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं पाता और बाद में पछताता है।

बच्चे की बात में ख़ुशी का राज

एक बच्चे के स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होने थे। उसे नाटक में हिस्सा लेने की बड़ी इच्छा थी। लेकिन भूमिकाएं कम थीं और उन्हें निभाने के इच्छुक विद्यार्थी बहुत Êयादा थे। सो, शिक्षक ने बच्चों की अभिनय क्षमता परखने का निर्णय लिया। इस बच्चे की मां उसकी गहरी इच्छा के बारे में जानती थी, साथ ही डरती भी थी कि उसका चयन न हो पाएगा, तो कहीं उस नन्हे बच्चे का दिल ही न टूट जाए।

बहरहाल, वह दिन भी आ गया। सभी बच्चे अपने अभिभावकों के साथ पहुंचे थे। एक बंद हॉल में शिक्षक बच्चों से बारी-बारी संवाद बुलवा रहे थे। अभिभावक हॉल के बाहर बैठे परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे।
घंटे भर बाद दरवाजा खुला। कुछ बच्चे चहकते हुए और बाक़ी चेहरा लटकाए हुए, उदास-से बाहर आए। वह बच्च दौड़ता हुआ अपनी मां के पास आया। उसके चेहरे पर ख़ुशी और उत्साह के भाव थे। मां ने राहत की सांस ली। उसने सोचा कि यह अच्छा ही हुआ, अभिनय करने की बच्चे की इच्छा पूरी हो रही है।
वह परिणाम के बारे में पूछती, इतने में बच्च ख़ुद ही बोल पड़ा, ‘जानती हो मां, क्या हुआ?’ मां ने चेहरे पर अनजानेपन के भाव बनाए और उसी मासूमियत से बोली, ‘मैं क्या जानूं! तुम बताओगे, तब तो मुझे पता चलेगा।’
बच्च उसी उत्साह से बोला, ‘टीचर ने हम सभी से अभिनय कराया। मैं जो रोल चाहता था, वह तो किसी और बच्चे को मिल गया। लेकिन मां, जानती हो, मेरी भूमिका तो नाटक के किरदारों से भी बड़ी मजेदार है।’ मां को बड़ा आश्चर्य हुआ। बच्च बोला, ‘अब मैं ताली बजाने और साथियों का उत्साह बढ़ाने का काम करूंगा!’\

बदले के चक्कर में डूबी लुटिया

बहुत समय पहले की बात है। उन दिनों इंसान अकेला रहता था। उसके पास गाय-बैल, घोड़ा, कुत्ता जैसे जानवर नहीं थे। सभी पशु अलग-अलग रहते थे और उनका दर्जा इंसान से जरा भी कम नहीं था। इंसान और बाक़ी जानवर आपस में बात करते, एक-दूसरे से कभी दोस्ती कर लेते और कभी लड़ भी पड़ते। ऐसे ही एक बार बैल और घोड़े में झगड़ा हो गया। दोनों पहले अच्छे दोस्त थे और झगड़ा बहुत मामूली बात पर हुआ था, लेकिन दोनों एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहा रहे थे। बैल और घोड़ा इसी फ़िराक़ में रहते थे कि कैसे अगले का नुक़सान किया जा सके।
सो, एक दिन घोड़ा इंसान के पास पहुंच गया। उसे पता था कि इंसान के पास बहुत दिमाग़ है और उसे दोनों हाथों और पैरों का कई तरह से इस्तेमाल कर सकने में महारत हासिल है। बैल से दुश्मनी के चक्कर में वह आदमी के पास मदद मांगने पहुंच गया था।
इंसान ने बड़े ग़ौर से उसकी बातें सुनीं। लगे हाथ बैल की बुराई भी कर दी। इससे घोड़ा बड़ा ख़ुश हुआ। उसने इंसान का भरोसा जीतने के लिए बताया कि बैल के पास काम करने के लिए बहुत ऊर्जा है, वह खेती समेत कई कामों में उसका मददगार हो सकता है।
इंसान ने कहा, ‘मैं बैल को काबू में लेकर उससे ग़ुलामों की तरह काम करवाऊंगा, लेकिन इसके लिए मुझे ऐसे साथी की जरूरत है, जो तेजी से दौड़ सके और मुझे बिठाकर बैल के पीछे दौड़ लगा सके।’ घोड़ा बोला, ‘मैं हूं न, तुम मेरे ऊपर बैठ जाना।’ आदमी झट से उसके ऊपर बैठ गया और उसकी नाक में नकेल कस दी। फिर उसने बैल को भी काबू में कर लिया। तब से बैल और घोड़ा, दोनों इंसान के सेवक बन गए।

सेवा की मिली मेवा लेकिन..
एक गिलहरी शेर की सेवा में लगी थी। वह थी तो छोटी-सी, पर अपनी पूरी क्षमता से शेर के काम करती। हरदम लगी रहती। शेर भी उसकी सेवा से ख़ुश था। उसने गिलहरी को इनाम में दस बोरी अखरोट देने का वादा किया। गिलहरी बड़ी ख़ुश हुई। उसे लगा कि उसकी मेहनत सार्थक हो गई। वह सपने देखने लगी कि दस बोरी अखरोट मिलने के बाद उसे काम करने की Êारूरत नहीं रहेगी। उसके बाद तो उसका सारा जीवन सुख और आराम से गुÊारेगा। लेकिन आज का सच यह था कि शेर ने वादा किया था, उसने अखरोट भरी बोरियां दी नहीं थीं।

फिर भी आस पक्की थी, क्योंकि यह शेर का वादा था, जो पूरा होना ही था। सो, गिलहरी दूने जोश से उसकी सेवा में जुट गई। वह काम करते-करते अपने पुराने साथियों को देखती, जो एक डाली से दूसरी डाली पर फुदकते रहते, कभी Êामीन पर उतर सरपट दौड़ पड़ते। गिलहरी को एक पल के लिए ख़ुद पर अफ़सोस होता, पर अगले ही पल उसके मन में आता कि ये लोग भले ही आज मौज-मस्ती कर रहे हैं, लेकिन जब मुझे अखरोटों के रूप में अपनी सेवा का पुरस्कार मिल जाएगा, मैं पूरी Êिांदगी मौज करूंगी।
इस तरह वह नन्ही-सी गिलहरी शेर की सेवा में जुटी रही। शेर कभी उससे ख़ुश हो जाता, कभी झिड़क भी देता। उसे एक अन्य जंगल में रहने वाले शेर की सेवा के लिए भी भेजा गया। हर मौक़े पर वह यही सोचती रही कि एक बार अखरोट मिल जाएं, बस! आख़िर गिलहरी को रिटायर कर दिया गया। और सचमुच, शेर ने उसे इनाम में दस बोरी अखरोट भी दिए। पर गिलहरी को ख़ुशी नहीं हुई। क्यों? क्योंकि उसके पूरे दांत झड़ चुके थे। अब अखरोट उसके किस काम के?

पाठशाला

डुबो न दे अति आत्मविश्वास

रसमपुर गांव में रहने वाले एक कुलीन ब्राह्मण परिवार ने अपने पूर्वजों की स्मृति में एक समारोह का आयोजन किया। समारोह समाप्त होने के बाद मेजबान परिवार के मुखिया ने घर आए रिश्तेदारों से अत्यंत संकोचपूर्वक कहा कि उसने उनके सम्मान में गाढ़ी मलाईदार खीर बनवाई थी, लेकिन अतिथियों की संख्या बढ़ जाने के कारण खीर कम हो गई है।

ऐसा कहते हुए उसने एक कटोरा भर खीर उनके सामने रखी और संकोचपूर्वक वहां से हट गया। मेहमानों ने देखा कि यह खीर तो केवल एक ही व्यक्ति भरपेट खा सकता है। उन्होंने आपस में एक प्रतियोगिता के आयोजन का विचार किया। राय बनी कि सभी मेहमान जमीन पर सांप का चित्र बनाएं और जो व्यक्ति सबसे पहले चित्र बनाए उसे पूरी खीर दे दी जाएगी। सारे लोग चित्र बनाने में जुट गए। उनमें से एक चित्रकला में निपुण था। अत: उसने शीघ्र ही सांप का सुंदर चित्र बना डाला। उसने देखा कि बाकी लोग तो चित्र की अभी शुरुआत ही कर रहे हैं। उसने सोचा कि जब तक ये लोग चित्र पूरा करते हैं, मैं जरा सांप के पैर बनाकर उसे और खूबसूरत बना दूं। उसने सांप के पैर बनाए। तब तक एक अन्य व्यक्ति ने भी सांप का चित्र बना लिया। दूसरे व्यक्ति ने खीर का कटोरा उठा लिया। इस पर निपुण चित्रकार ने आपत्ति करते हुए कहा कि उसने चित्र पहले ही बना लिया था, बाद में तो वह सिर्फ पैर बना रहा था, अत: खीर पर उसका हक बनता है।
विवाद गहराते देख दूसरे चित्रकार ने कहा कि चूंकि शर्त सांप का चित्र बनाने की थी इसलिए तुम हार गए, क्योंकि पैर वाला जीव सांप नहीं हो सकता। निपुण चित्रकार हाथ मलता रह गया।

 मन चंगा तो कठौती में गंगा
उत्कल ऋषि के आश्रम में सैकड़ों युवा साधु अध्ययन और ध्यान आदि के प्रशिक्षण में रत रहते थे। उनमें उज्ज्वल और प्रखर नामक दो साधुओं की छवि अलग थी। दोनों बेहद प्रतिभाशाली और योग्य थे। उनके चेहरे पर एक अलग तरह का तेज था। एक बार की बात है, दोनों कहीं जा रहे थे कि तभी अचानक जोर की बारिश आ गई।

कच्ची सड़क पर बारिश का पानी एकत्रित हो गया और वहां भारी कीचड़ हो गया। बीच सड़क पर बारिश से घिरे उज्ज्वल और प्रखर की निगाह कुछ दूर एक सुंदर युवती पर पड़ी। वह इस दुविधा में खड़ी थी कि अगर उसने कीचड़ को पार करने की कोशिश की तो उसके सुंदर वस्त्र खराब हो जाएंगे। उज्ज्वल युवती की मदद करने के इरादे से उसके पास पहुंचा और उसकी अनुमति लेकर उसने अपनी बांहों के सहारे से उसे सड़क पार करा दी। युवती ने दोनों साधुओं को धन्यवाद दिया। दोनों आगे निकल गए। प्रखर को यह अच्छा नहीं लगा। कई दिन बीत गए।
आखिर एक दिन प्रखर ने अपने मन की बात उज्‍जवल से कह डाली, ‘उज्ज्वल, उस दिन तुमने अच्छा नहीं किया था। हम ब्रह्मचारी साधु हैं। हमारे लिए स्त्रियों और खासकर युवतियों को देखना भी पाप है और तुमने उस दिन उस सुंदरी को बाहों में उठा लिया।’ प्रखर की आपत्ति पर उज्ज्वल ने विनम्रता से कहा, ‘भाई, स्त्री-पुरुष से पहले हम सभी इंसान हैं और जरूरतमंद की मदद करना हमारा सबसे बड़ा धर्म होना चाहिए। मैंने तो उस युवती को उसी समय सड़क किनारे उतार दिया था प्रखर, लेकिन लगता है कि तुम अब तक उसे अपने मन में उठाए हुए हो।’
सबक: सद्भावना या दुर्भावना हमारी हमारे मानस में होती है। बाहर की परिस्थितियों में नहीं। हमारा आचरण परिस्थिति के अनुरूप और सही है तो उसे लेकर दुर्भावना मन में नहीं लाना चाहिए।


नैसर्गिकता से खिलवाड़ नहीं

सुंदरपुर शहर में एक धनी सेठ रहते थे, जिनका नाम रूपचंद था। नाम के अनुरूप ही रूपचंद काफी खूबसूरत थे। उन्होंने दो विवाह किए थे। दो पत्नियों में से एक उनकी हमउम्र थीं जिनका नाम रूपा था। दूसरी पत्नी चंदा उनसे दस साल छोटी थी। दोनों ही पत्नियां पति को बहुत मानती थीं।

सेठ रूपचंद भी पूरी कोशिश करते थे कि व्यस्त कामकाज के बावजूद दोनों पत्नियों को पूरा समय दे सकें। वे उन पर पर्याप्त स्नेह रखते थे। उधर दोनों पत्नियों का भी पूरा जोर इस बात पर होता कि सेठ का खानपान और पहनावा आदि उनकी मर्जी के मुताबिक हो। सेठ का यश चारों ओर फैला हुआ था। उनका सभी बहुत सम्मान भी करते। एक दिन की बात है, कहीं बाहर निकलने से पहले सेठ अपने बालों को संवार रहे थे। अचानक उनकी नजर अपने सफेद बालों पर पड़ी। उस समय उनके साथ चंदा भी थी।
सेठ ने हंसकर कहा कि वह तो अब बूढ़ा हो चला है। छोटी पत्नी चंदा को भी चिंता होने लगी कि उसका पति बूढ़ा हो रहा है। पति के सामने वह बहुत छोटी दिखेगी। काफी सोच-विचार के बाद चंदा ने इसका उपाय खोजा। रात में जब पति सो रहा था तो चंदा ने सेठ के सिर से सफेद बाल चुन-चुनकर निकालने शुरू कर दिए ताकि वह जवान दिखाई दे। अगली रात दूसरी पत्नी रूपा ने जब पति के सिर से सफेद बाल गायब देखे तो उसे चिंता होने लगी कि वह कहीं पति से पहले वृद्घ न दिखने लगे। बस उसने पति के सिर से सारे काले बाल उखाड़ दिए। अगले दिन सेठ रूपचंद ने जब अपने सिर के सारे बाल गायब देखे तो उसकी हैरानी और दुख का ठिकाना नहीं रहा।
सबक अगर हम अपने आस-पास की किसी वस्तु या इंसान को पूरी तरह अपने हिसाब से ढालने लगेंगे तो उस की नैसर्गिक सुंदरता को नष्ट ही करेंगे।

किताबी ज्ञान पर भारी अनुभव

रतनपुर गांव का नाम मशहूर था क्योंकि वहां प्रसिद्घ गणितज्ञ रामेश्वर रहा करते थे। दूर-दूर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने उनके पास आया करते थे। उनमें से चार प्रतिभाशाली शिष्यों पर उनका विशेष स्नेह था। उन चारों के गणित संबंधी ज्ञान की चर्चा दूर दूर तक थी। एक बार की बात है।

लगातार शिक्षा-दीक्षा की एकरसता दूर करने के विचार से चारों मित्र बाहर घूमने के लिए निकले ताकि जीवन में थोड़ा नई तरह का परिवर्तन आए। अभी उन्होंने कुछ ही दूरी तय की थी कि रास्ते में नदी आ गई। समस्या यह थी कि चारों में से एक को भी तैरना नहीं आता था और आसपास कोई नाव भी नहीं दिख रही थी।
उन्होंने आपस में राय-मशविरा किया और इस समस्या का हल भी गणित के जरिए निकालने की ठानी। उन्होंने पास ही पशु चरा रहे एक व्यक्ति से नदी की गहराई के बारे में पूछताछ की। पूछताछ के बाद चारों मित्र इस नतीजे पर पहुंचे कि चूंकि नदी दोनों किनारों पर बहुत उथली है और बीच धार में उसकी गहराई बहुत अधिक नहीं है इसलिए नदी की औसत गहराई चार फीट के करीब होनी चाहिए। उन्हें लगा कि किनारों पर पानी उनके घुटनों के नीचे रहेगा जबकि बीच में कुछ देर के लिए पानी उनके सर के ऊपर से निकलेगा उसके बाद फिर किनारा आ जाएगा। बस फिर क्या था। चारों मित्र आश्वस्त होकर नदी में उतर गए।
किनारे खड़ा चरवाहा उन्हें रोकता रहा लेकिन वे हंसते हुए उसकी अनदेखी कर पानी में घुस गए। जाहिर है नदी की गहराई औसत मान से नहीं मापी जा सकती। बस फिर क्या था, बीच धार की गहराई ने उन्हें डुबा दिया और वे असमय काल के गाल में समा गए।

किस वेश में मिल जाए भगवान...

एक छोटा बच्चा जूते के शोरूम के बाहर खड़ा डिस्प्ले में रखे जूतों को देर से निहार रहा था। वहां कई डिजाइनों में झक सफ़ेद से लेकर अलग-अलग रंगों के ढेर सारे जूते रखे थे। वह कभी किसी जूते को देखता, कुछ सोचता, कुछ बुदबुदाता और कभी दूसरे जूतों को।

अचानक एक महिला उसके पास पहुंची। उसकी उम्र 40-45 वर्ष की रही होगी। चेहरे-मोहरे और पहनावे से वह संभ्रांत परिवार की लग रही थी। बच्चे को ध्यान ही नहीं था कि कोई उसके पास खड़ा है, लेकिन जब महिला ने उसके सिर पर हाथ फेरा, तो उसने चौंककर देखा। महिला ने पूछा, ‘तुम इतने ग़ौर से क्या देख रहे हो?’ बच्चे के मन में जो था, उसने साफ़-साफ़ बता दिया, ‘मैं भगवान को मना रहा था कि काश! वह एक जोड़ी जूते मुझे दिला दे।’
उसकी बात सुनकर महिला मुस्कराई और उसका हाथ पकड़कर शोरूम के भीतर ले गई। वहां उसने बच्चे के माप के 10 जोड़ी मोजे निकालने का आदेश दिया। बच्चे को बड़ा आश्चर्य हो रहा था। फिर उस महिला ने दुकानदार से पानी भरी बाल्टी और तौलिया मांगा। उसके बाद वह बच्चे को लेकर दुकान के पीछे ले गई और साबुन-पानी से उसके पैर अच्छी तरह साफ़ किए। फिर उन्हें तौलिए से सुखाया।
इसके बाद उसने अपने हाथों से बच्चे को मोजे पहनाए और बाक़ी मोजे उसके झोले में डाल दिए। फिर वह उसे लेकर डिस्प्ले में गई और पूछा कि वह किस जूते के लिए कह रहा था। बच्चे ने जिस जूते की ओर इशारा किया, उसने निकलवाकर ख़ुद उसे पहनाया और उसके चेहरे की ओर देखने लगी। हैरान बच्चे ने उससे पूछा, ‘क्या आप भगवान की पत्नी हैं?’

गधा काम छोड़ जाता क्यों नहीं

एक गधा अपने मालिक से बहुत परेशान था। इतना परेशान कि उसका मन करता, तुरंत रस्सी तुड़ाकर भाग जाए।

पर पता नहीं क्यों, गधा भागता नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि गधा कामचोर हो। वह मेहनत से काम करता और जब तक कि थककर चूर नहीं हो जाता, सुस्ताने के लिए बैठता नहीं था। कितना भी बोझ लाद दिया जाए, उफ तक नहीं करता था। लेकिन गधे का मालिक कभी न तो उसके सिर पर हाथ फेरता, न कभी उसकी तारीफ़ करता। ऐसा भी नहीं था कि गधे को बहुत अच्छा दाना-पानी या सुख-सुविधाएं मिल रही हों। उसे बस सूखा चारा और पानी मिल जाता था। हद हो गई, तो किसी बड़े त्योहार के मौक़े पर घर की जूठन मिल जाती।
फिर भी गधा संतुष्ट था। हालांकि उसकी परेशानी में कोई कमी न थी। पास-पड़ोस के गधे उस पर दया करते। वे कम काम करते थे और उन्हें दाना-पानी भी अच्छा मिलता था। वे अक्सर पीड़ित गधे को बताते थे कि उनके मालिक उसकी तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि यदि ऐसा गधा उनके पास हो, तो वे उसे कितने प्यार से रखेंगे। इतना ही नहीं, वे तो साथी गधे से कहते भी थे कि वह उनके साथ भाग चले, तो दूर, किसी न किसी जगह उसे काम पर लगवा ही देंगे, जहां निश्चित तौर पर वर्तमान से अच्छी परिस्थितियां होंगी।
लेकिन गधा कम खाकर, ज्यादा काम कर भी अपने मालिक की डांट-फटकार और मार सह रहा था। आख़िर एक दिन बहुत पूछने पर गधे ने अपने साथी को बताया- ‘मेरे मालिक की एक बहुत सुंदर बेटी है। और मालिक जब भी उससे नाराज होता है, कहता है तेरी शादी तो मैं किसी दिन गधे से कर दूंगा। बस, उसी दिन की आस में काम कर रहा हूं।’
सबक़हम सब के भीतर भी एक गधा होता है, जो असंतुष्टियों के बावजूद अपने वर्तमान काम में जुटा रहता है और असंभव की कल्पना में ख़ुश रहता है। सोचिए, क्या भविष्य में पुरस्कार की आस वर्तमान ख़ुशी से बड़ी है?

आपके पैर दौड़ते हैं या मन..?

उस बच्ची को पैरों में तकलीफ़ थी। डॉक्टर कहते थे कि उसके पैर में एक मांसपेशी जन्म से ही नहीं थी। इसलिए उसे चलने के लिए थोड़ा ज्यादा प्रयास करना पड़ता था। बावजूद इसके उसके उत्साह में कोई कमी नहीं थी। न तो वह अकेली रहती थी और न ही उसे चुपचाप बैठे रहना पसंद था। एक दिन वह स्कूल से वापस आकर अपने पिता को बताने लगी कि उस दिन स्कूल में ढेर सारी खेलकूद प्रतियोगिताएं हुईं और उसने उनमें से कई स्पर्धाओं में भाग लिया।

पिता अपनी बेटी की लाचारी के बारे में जानता था। इसलिए जब बेटी दिनभर की गतिविधियों के बारे में बता रही थी, तब पिता का दिमाग़ यह सोच रहा था कि कैसे अपनी बेटी को प्रोत्साहित किया जाए और यह बताया जाए कि छोटी-छोटी असफलताओं से जीवन में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। उसका अनुमान था कि पैरों से थोड़ी लाचार बेटी ने दौड़-भाग वाली स्पर्धाओं में हिस्सा तो लिया होगा, पर वह सब में हार ही गई होगी।
लेकिन बेटी ने जब बताया कि दो प्रतियोगिताओं में उसे जीत मिली है, तो पिता की हैरानी का ठिकाना नहीं रहा। फिर जब बेटी ने बताया कि उसे जीत इसलिए मिली, क्योंकि पैरों में कमजोरी होने के कारण उसे विशेष लाभ मिला था, तो पिता सोचने लगा कि उसे बाक़ी बच्चों से पहले दौड़ शुरू करने की छूट दे दी गई हो या उसके लिए दूरी कम कर दी गई हो।
लेकिन एक बार फिर उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही, जब बेटी ने बताया कि उसे क्या सौगात मिली थी। बेटी बोली, ‘मुझे छूट नहीं मिली थी। दरअसल, मेरे साथ अच्छी बात यह थी कि मुझे चलने के लिए ज्यादा कोशिश करनी पड़ती है, इसलिए मैंने दौड़ने के लिए और ज्यादा कोशिश की..और मैं जीत गई!’

Tuesday, September 21, 2010

पाठशाला

मौत के सामने भी अक्ल दौड़ती रही

जंगल घना था। पेड़-झाड़ इतने थे कि राह नहीं सूझती थी। ऐसे में एक बेचारी लोमड़ी के रास्ते में अचानक शेर आ गया। अब लोमड़ी भागे भी तो किधर। उसे डर तो लग रहा था, पर वह थी पक्की लोमड़ी। सो, तेजी से दिमाग़ के घोड़े दौड़ाने लगी। उधर शेर निश्चिंत था कि शिकार कहीं भागकर नहीं जा सकता। 
वह लोमड़ी पर झपटने की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक लोमड़ी ने डपटकर पूछा, ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, मेरी राह में आने की? क्या तुम्हें उस भगवान का डर नहीं, जिसने मुझे भेजा है?’ शेर ने ऐसे किसी सवाल के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। एक पल के लिए तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। फिर जब उसके भीतर का शेर जागा, तो उसने हिम्मत करके सवाल किया, ‘तुम ऐसा कैसे कह सकती हो? क्या सबूत है कि तुम्हें ईश्वर ने भेजा है?’
लोमड़ी तो इस सवाल के लिए तैयार ही खड़ी थी। उसने कहा, ‘इसमें कौन-सी बड़ी बात। तुम मेरे साथ जंगल में घूमो और ख़ुद ही देख लेना। तुम बस मेरे पीछे-पीछे चलो और अपनी आंखों से देख-जान लो कि जंगल के बाक़ी प्राणी मेरी कितनी इज्जत करते हैं। यहां तक कि वे मेरे रास्ते में भी नहीं आते।’
सो, शेर लोमड़ी के पीछे-पीछे चलने लगा। और वाक़ई, उसने देखा कि राह में आने वाले छोटे-मोटे जानवर तो काफ़ी दूर से ही दुम दबाकर भाग जाते थे और बड़े जानवर भी उसके रास्ते में आने की बजाय राह बदलकर निकल जाते थे। Êाहिर है, बाक़ी जानवर लोमड़ी के पीछे चल रहे शेर को देखकर डर रहे थे। पर इस उपाय से लोमड़ी की जान बच गई।

सबक : संकट के समय भी दिमाग़ ठंडा होना होना चाहिए और अक्ल के घोड़े दौड़ते रहने चाहिए, क्योंकि अक्सर ऐसे मौक़ों पर सिर्फ़ अक्लमंदी ही होती है, जो हमें उबार सकती है। बुद्धि ही असली मित्र है

जो डरता है वह डरता ही रहता है

एक चूहा था। उसे बिल्ली से बड़ा डर लगता था। हालांकि यह स्वाभाविक है कि चूहे को बिल्ली से डर लगे, पर इस चूहे को कुछ ज्यादा ही डर लगता था। अपने सुरक्षित बिल में सोते हुए भी सपने में उसे बिल्ली नजर आती। हल्की-सी आहट से उसे बिल्ली के आने का अंदेशा होने लगता। सीधी-सी बात यह कि बिल्ली से भयभीत चूहा चौबीसों घंटे घुट-घुटकर जीता था।
ऐसे में एक दिन एक बड़े जादूगर से उसकी मुलाक़ात हो गई। फिर तो चूहे के भाग ही खुल गए। जादूगर को उस पर दया आ गई, तो उसने उसे चूहे से बिल्ली बना दिया। बिल्ली बना चूहा उस समय तो बड़ा ख़ुश हुआ, पर कुछ दिनों बाद फिर जादूगर के पास पहुंच गया, यह शिकायत लेकर कि कुत्ता उसे बहुत परेशान करता है।
जादूगर ने उसे कुत्ता बना दिया। कुछ दिन तो ठीक रहा, फिर कुत्ते के रूप में भी उसे परेशानी शुरू हो गई। अब उसे शेर-चीतों का बड़ा डर रहता। इस दफ़ा जादूगर ने सोचा कि पूरा इलाज कर दिया जाए, सो उसने कुत्ते का रूप पा चुके चूहे को शेर ही बना दिया। जादूगर ने साचा कि शेर जंगल का राजा है, सबसे शक्तिशाली प्राणी है, इसलिए उसे किसी से डर नहीं लगेगा। 
लेकिन नहीं। शेर बनकर भी चूहा कांपता ही रहा। अब उसे किसी और जंगली जीव से डरने की जरूरत नहीं थी, पर बेचारे को शिकारियों से बड़ा डर लगता। आख़िर वह एक बार फिर जादूगर के पास पहुंच गया। लेकिन इस बार जादूगर ने उसे शिकारी नहीं बनाया। उसने उसे चूहा ही बना दिया। जादूगर ने कहा- ‘चूंकि तेरा दिल ही चूहे का है, इसलिए तू हमेशा डरेगा ही।’ 
सबक : डर कहीं बाहर नहीं होता, वह हमारे भीतर ही होता है। स्वार्थ की अधिकता और आत्म-विश्वास की कमी से हम डरते हैं। इसलिए अपने डर को जीतना है, तो पहले ख़ुद को जीतना पड़ेगा।

भगवान खिलाए कौन-कौन खाए

एक प्रसिद्ध आदमी था। वह ईमानदारी और मेहनत के साथ समाजसेवा के कार्यो के लिए भी जाना जाता था। एक दिन बाजार में एक भिखारी ने उसके आगे हाथ पसारा। समाजसेवी को न जाने क्या सूझा कि उसने भिखारी से कहा, ‘चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें भीख से कुछ ज्यादा देना चाहता हूं।’ भिखारी को लेकर वह अपने एक परिचित दुकानदार के पास पहुंचा। समाजसेवी ने कहा कि वह उसे कोई काम दे दे। 
चूंकि लोग उस पर भरोसा करते थे, इसलिए दुकानदार ने भी उसके बताए आदमी, यानी भिखारी को कुछ सामान देकर आसपास के गांवों में बेचने का काम दे दिया। कुछ दिनों बाद जब वह समाजसेवी फिर से बाजार से गुजर रहा था, तो उसने भिखारी को हाथ फैलाए हुए पाया। जब उसने काम के बारे में पूछा, तो भिखारी ने बताया, ‘मैं सामान लेकर गांव-गांव घूमता था। एक बार मैंने देखा कि एक अंधा बाज पेड़ के नीचे बैठा हुआ था। 
मुझे उत्सुकता हुई कि आख़िर वह अपने लिए खाने का इंतजाम कैसे करता होगा! तभी मैंने देखा कि एक और बाज चोंच में खाना भरकर लाया और उसे खिलाने लगा। तभी मेरे दिमाग़ में आया कि भगवान सबकी परवाह करता है। अगर उसने अंधे बाज के लिए भोजन का प्रबंध किया, तो वह मेरे लिए भी जरूर करेगा। इसलिए मैंने काम छोड़ दिया।’ उसका क़िस्सा सुनकर समाजसेवी ने इतना ही कहा, ‘यह सही है कि ऊपरवाला कमजोरों का भी ध्यान रखता है। लेकिन वह तुम्हें सबल बनने का विकल्प भी देता है। फिर तुमने अंधा बाज बनने की बजाय खाना खिलाने वाला पक्षी बनने का विकल्प क्यों नहीं चुना?’
सबक : भगवान की आड़ में अपनी अकर्मण्यता और आलस को सही न ठहराएं। जब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म का महत्व बता दिया, तो बस भगवान भरोसे ही बैठे रहना मूर्खता ही है

पाठशाला



कौन हंसता है कौन रोता है.

एक आदमी साइकोलॉजिस्ट से मशविरा लेने आया था। वह अपनी बारी के इंतज़ार में चेंबर के बाहर बैठा था। उसकी शक्ल से ही लग रहा था कि वह महादुखी मानव है। चेहरा लटका हुआ, होंठों पर हंसी का एक निशान तक न था।वह औरों से बोलना तो दूर, उनकी तरफ़ देख भी नहीं रहा था। कुछ देर बाद उसका भी नंबर आया। साइकोलॉजिस्ट अनुभवी था। वह उसे देखते ही पहचान गया कि यह अवसाद का केस है। फिर भी उसने समस्या पूछी। आदमी ने बोलना शुरू किया,‘डॉक्टर साहब, मैं हमेशा हताशा में ही डूबा रहता हूं। चाहे कुछ भी कर लूं, मन में उत्साह जागता ही नहीं।  

अब आप ही बताएं कि मैं क्या करूं!’ मनोचिकित्सक ने कहा, ‘मेरे साथ उस खिड़की तक आओ।’ जब वह उसके पीछे वहां तक पहुंचा, तो मनोचिकित्सक ने खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, ‘तुम दूर वो तंबू देख रहे हो? वह सर्कस का तंबू है। मैंने वह सर्कस देखा है, बहुत शानदार है। वहां तुम्हें ढेर सारे करतब देखने को मिलेंगे,ख़ासतौर पर एक जोकर के कारनामे देखकर तो हंस-हंस कर लोट-पोट हो जाओगे। वह जब तक तुम्हारी नज़रों के सामने रहेगा, तुम हंसी नहीं रोक पाओगे। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं कि एक बार उस जोकर की कलाकारी देख लेने के बाद अवसाद ज़िन्दगी में दुबारा तुम्हारे पास नहीं फटकेगा।’
यह सब सुनकर भी उस आदमी के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं आई। उसका लटका मुंह देखकर साइकोलॉजिस्ट ने कहा, ‘तुम वहां जाकर तो देखो।’ वह आदमी बोला, ‘साहब, वह जोकर मैं ही हूं।’  

सबक: इस दुनिया में हर कोई अभिनय कर रहा है। हंसी-मजाक की ओट में कोई ग़म छिपा रहा है, तो कोई बेवजह आंसू बहाकर औरों से सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है

सिक्का उछाल जान लो भाग्य

राजा को गुप्तचरों ने सूचना दी कि पड़ोसी राज्य की सेनाएं उस राज्य पर धावा बोलने के लिए निकल चुकी हैं। उसने सेनापति को उन्हें राज्य की सीमा पर रोक देने का आदेश दिया। सेनापति अपनी सफलता को लेकर आश्वस्त था, क्योंकि उनके पास कहीं ज्यादा बड़ी सेना थी। लेकिन उसके सैनिकों को अपनी जीत पर संदेह था।सेनापति ने कई तरह से समझाया, दोनों सेनाओं की तुलना के ढेर सारे तथ्य बताए, पर सैनिकों के मन में अकारण बैठ गया था कि हमारी हार ही होनी है। बावजूद इसके सेनापति सेना लेकर निकल पड़ा, पड़ोसी सेना को सीमा पर ही रोक देने के लिए। रास्ते में एक मंदिर था। परंपरा के अनुसार वे वहां पूजा के लिए रुके। सैनिकों ने अपनी जीत की कामना की, पर उन्हें अब भी जीत का भरोसा नहीं था।  

तभी सेनापति ने अपने सैनिकों को संबोधित करना शुरू किया। उसने कहा, ‘हम यह सिक्का उछालकर देखेंगे कि नियति में क्या लिखा है। अगर चित आया, तो हमारी जीत होगी और पट आया, तो हार।’ सैनिक उत्सुकता से देखने लगे। सेनापति ने सिक्का उछाला और यह चित था। सैनिकों में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी।  

कहना न होगा कि उन्होंने पड़ोसी राज्य की सेना को न सिर्फ़ अपनी सीमा पर रोक दिया, बल्कि काफ़ी दूर तक खदेड़ भी आए। बाद में एक युवा सैनिक ने सेनापति से कहा, ‘सचमुच, जो नियति में लिखा होता है, वही होता है।’ सेनापति ने जवाब देने की बजाय उसे वह सिक्का दिखा दिया। उस सिक्के के दोनों तरफ़ चित वाला ही निशान था। फिर क्या था, सेनापति वहीं अपना माथा पकड़कर बैठ गया। 

सबक : भाग्य में जो लिखा है, वह तो होगा ही, लेकिन भाग्य में क्या लिखा, यह नियति रचने वाले, यानी ईश्वर के अलावा और कोई भी सही-सही नहीं बता सकता

प्रोत्साहित करने की ताक़त.

एक बार एक वृद्ध व्यक्ति 19 वीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार दांते गैब्रियल रोसिटी के पास पहुंचा। उस वृद्ध व्यक्ति के पास कुछ स्केच और कलाकृतियां थीं, जिन्हें वह रोसिटी को दिखाना चाहता था, जिससे वह जान सके कि ये पेंटिंग कैसी हैं और कम से कम इनके माध्यम से टैलेंट का पता चल जाए। रोसिटी ने उन्हें बड़े ध्यान से देखा।  

शुरुआत की कुछ कलाकृतियां, जिनमें जरा सा भी कला प्रेम नहीं दिख रहा था, रोसिटी को बेकार लगीं, लेकिन वह एक दयालु आदमी था, इसलिए उसने बड़े ही उदार भाव से कहा कि इन तस्वीरों में योग्यता नजर नहीं आती। ऐसा कहते हुए रोसिटी दुखी हुए, लेकिन उस आदमी से झूठ नहीं बोल सकते थे। वह वृद्ध व्यक्ति दुखी था, लेकिन उसे रोसिटी के निर्णय का इंतजार था। उसने रोसिटी से उसका समय लेने के लिए माफी मांगी और उसे कुछ और कलाकृतियां दिखाई। इन्हें एक स्टूडेंट ने बनाया था।  

रोसिटी ने जब इन स्केच को देखा, तो वह उन्हें देखकर खुशी से झूम उठा। उसने कहा, ये तो बहुत अच्छी है। इन्हें बनाने वाले स्टूडेंट में बहुत प्रतिभा है। एक कलाकार के रूप में उसके करियर को मदद और प्रोत्साहन देने के लिए उसकी हर संभव मदद करनी चाहिए। अगर वह इसी क्षेत्र में रहकर मेहनत करता है, तो इसका भविष्य बहुत अच्छा है। रोसिटी ने देखा कि वह बूढ़ा आदमी काफ़ी उदास था।  

रोसिटी ने उससे पूछा, यह बेहतरीन कलाकार क्या तुम्हारा बेटा है? उस बूढ़े आदमी ने दुखी होकर यह कहा। यह मैं हूं-आज से चालीस साल पहले। काश, यह मैंने पहले आप की यह तारीफ सुनी होती। हतोत्साहित होकर सालों पहले मैंने यह काम छोड़ दिया।

बनावटी जीवन से बचकर रहें

मध्यम उम्र की एक महिला को दिल का दौरा पड़ने पर तत्काल अस्पताल ले जाया गया। ऑपरेशन की टेबल पर मानो उसे बिल्कुल नजदीक से मौत का एहसास हुआ। भगवान को देखकर उसने पूछा,‘हे, भगवान, क्या मेरा अब अंतिम व़क्त आ गया है?’  

भगवान ने कहा, ‘नहीं, अभी तो तुम्हारे पास 43 साल, दो महीने और आठ दिन शेष हैं जीने के लिए।’ बहरहाल, उसका ऑपरेशन अच्छी तरह हुआ और वह पूरी तरह ठीक भी हो गई।  

लेकिल ठीक होने के बावजूद वह महिला अपने घर जाने के लिए तैयार नहीं थी। उसने अस्पताल में ही रहने का निश्चय किया। फिर अस्पताल में ही उसने अपने चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी कराई और अपने चेहरे-मोहरे, होठों आदि को सही कराया। फिर अपने पेट पर चढ़ गई अतिरिक्त चर्बी को हटवाया। इस तरह उसे अपने शरीर में के अंग-अंग में जहां-जहां कोई कमी-खामी दिख रही थी, वह सब ठीक कराई। यहां तक कि उसने अपने बालों के रंग को भी बदलने के लिए किसी को बुला रखा था।  

जाहिर है, उसके पास जीने के लिए काफ़ी व़क्त था, इसलिए उसने अपने आप को काफी अच्छी तरह से मेंटेन कर लिया। इस तरह अंतिम ऑपरेशन के बाद उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।

लेकिन घर के लिए जाते व़क्त रोड क्रॉस करते समय एंबुलेंस की टक्कर में उसकी मौत हो गई। अब भगवान के सामने आने पर उसने कहा, ‘भगवान आपने कहा था कि अभी मेरे पास जीने के लिए 40 साल और हैं?’ इस पर भगवान ने उससे कहा, ‘मैंने आपको नहीं पहचाना।’ 

सबक़ सच बात यही है कि क़ुदरत ने आपको जो रंग-रूप, आकार-प्रकार दिया है, वही सच है। बनावटी जीवन आपके लिए ख़तरा बन सकता है। और आप अपनी पहचान भी खो सकते हैं






 

Friday, September 17, 2010

पाठशाला

खोल से बाहर निकालने का तरीक़ा

जाड़े के दिन थे। एक छोटे बच्चे को कहीं पर एक छोटा कछुआ मिल गया। कछुआ अपनी राह जा रहा था। बच्चे ने उसे देखा, तो हाथों में उठा लिया। उसका स्पर्श पाते ही कछुआ अपने स्वभाव के अनुरूप तुरंत खोल में घुस गया। बच्चे ने लाख कोशिश कर ली, पर उसने मुंह और हाथ-पैर बाहर नहीं निकाले। उसने उन्हें बाहर खींचने की कोशिश की, लकड़ी से कुरेदा, पर कछुआ टस से मस न हुआ। हारकर वह बच्च उसे अपने घर ले आया। उसका ख्याल था कि घर में कछुआ कभी तो खोल से बाहर निकलेगा। लेकिन वहां वह चेहरा जरा सा बाहर निकालता और आसपास देखते ही फिर अंदर कर लेता। बच्चे ने उसके सामने खाना-पानी रखा, पर कोई असर न हुआ। 
बच्च बड़ी देर तक इंतजार करता रहा। उसके चाचा उसे लगातार देख रहे थे। आख़िरकार वे बोले, ‘कछुआ भले ही मर जाएगा, पर इस तरह से खोल से बाहर नहीं आएगा। आओ, मैं तुम्हें बताता हूं, उसे बाहर निकालने का सही तरीक़ा क्या है।’ चाचा ने कछुए को उठाया और उसे अंगीठी के पास रख दिया। जाड़े के दिन थे। कछुए को थोड़ी गर्मी का एहसास हुआ, तो उसने पहले सिर निकाला और फिर धीरे से हाथ-पैर भी बाहर निकाल लिए। 
बच्च हैरान था कि यह कैसे हो गया। जिस काम के लिए वह घंटे भर से कोशिश कर रहा था फिर भी नाकामयाब रहा, वह पांच मिनट में हो गया। चाचा ने उसे बताया, ‘कछुए ऐसे ही खोल से बाहर आते हैं और इंसान भी। आप उनसे जबरदस्ती कुछ नहीं करा सकते। पहले आपको उन्हें दयालुता के साथ गर्मजोशी देनी पड़ती है, तभी वे आपसे खुलते हैं।’ 
सबक़ 
लोगों को आप जितना भी खिला-पिला लें, घर ले जाएं, आव-भगत कर लें, पर वे तब तक आपसे नहीं खुलेंगे, जब तक कि उनसे गर्मजोशी व आत्मीयता का व्यवहार 
न किया जाए




पालतू मछलियां वापस आएंगी क्या

एक आदमी को मछलियां पकड़ने का बहुत शौक़ था। वह जहां भी जाता, झील या तालाब जरूर खोजता। एक बार वह किसी अनजान शहर में झील किनारे बैठकर मछलियां पकड़ रहा था। वह मछलियां पकड़कर पानी भरी बाल्टी में डालता जाता। जब बाल्टी में ढेर सारी मछलियां तैरने लगीं, तो वह होटल वापस जाने के लिए उठा। इसी समय एक सरकारी कर्मचारी ने उसका रास्ता रोक लिया। कर्मचारी ने रोब दिखाते हुए कहा, ‘क्या आप नहीं जानते कि इस झील पर मछलियां पकड़ना मना है?’
आदमी ने जवाब दिया, ‘नहीं, यहां ऐसा कोई बोर्ड भी नहीं लगा है।’ यह सुनकर कर्मचारी की बांछें खिल गईं। उसने अपना मुंह सटाते हुए कहा, ‘चिंता मत कीजिए, मैं आपका ज्यादा नुक़सान नहीं होने दूंगा। यहां मछली पकड़ने का फ़ाइन सौ रुपए है, पर आप तो मुझे दस ही दे दीजिए और आराम से निकल जाइए।’
अब उस आदमी को ग़ुस्सा आया। पर उसने शांति से कहा, ‘मछली पकड़ना मना है..पर मैं तो अपनी पालतू मछलियों को घुमाने लाया था। मैं रोज उन्हें किसी झील, तालाब या पोखर में छोड़ देता हूं और कुछ समय बाद जब सीटी बजाता हूं, तो वे वापस आ जाती हैं।’
कर्मचारी को उसकी बात पर जरा भी यक़ीन नहीं हुआ। उसने व्यंग्य से कहा, ‘अच्छा! जरा मेरे सामने ऐसा करके तो दिखाइए।’ उस आदमी को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। उसने पूरी बाल्टी झील में उलट दी। और वापस जाने लगा। कर्मचारी ने उसे रोका, बोला, ‘मछलियों को वापस तो बुलाओ!’ उस आदमी ने जवाब दिया, ‘कैसी मछलियां? मैं तो यहां ख़ाली हाथ, झील के किनारे टहलने आया था!’
सबक़
जैसे को तैसा जरूरी है। अगर कोई बेईमान, ग़लत काम या भ्रष्टाचार के लिए बाध्य करे, तो उसे बेवकूफ़ बनाने के लिए दिमाग़ लगा कर थोड़ा झूठ बोल देने में बुराई नहीं है।

ख़ुद निकाल लो या इंतजार करो

एक बच्चा अपनी मां के साथ किसी रिश्तेदार के घर गया हुआ था। बच्च बड़ा प्यारा था। रिश्तेदार ने जब मां को चाय बनाकर दी, तो बच्चे को भी कुछ देना जरूरी था। सो, वह टाफ़ियों से भरा मर्तबान ले आया। उसने ढक्कन खोलकर बच्चे से कहा, ‘बेटे, इसमें से जितनी चाहो, टाफ़ियां ले लो।’
और कोई बच्च होता, तो ख़ुश होकर तुरंत मर्तबान में हाथ डाल देता, पर इस बच्चे ने कुछ नहीं किया, चुपचाप खड़ा रहा। रिश्तेदार ने दुबारा कहा और मर्तबान उसके थोड़ा और पास ले गया। लेकिन बच्च टाफ़ियों को देखता रह गया, पर उसने हाथ नहीं बढ़ाया। अब तो अजीब स्थिति हो गई। न तो मेजबान ने, न मां ने सोचा था कि वह ऐसी बात करेगा।
मां जानती थी कि बच्चे को टाफ़ियां बहुत पसंद हैं, इसलिए उसे और ज्यादा हैरानी हो रही थी। मां को लगा कि बच्च रिश्तेदार के सामने झिझक रहा है, इसलिए इस बार उसने ख़ुद कहा कि बेटे टाफ़ियां निकाल लो। लेकिन बच्चे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, वह वैसे ही खड़ा रहा।
आख़िर रिश्तेदार ने एक मुट्ठी टाफ़ियां निकालीं और उन्हें बच्चे की दोनों जेबों में डाल दिया। बच्च ख़ुश। अब मां को बेहद उत्सुकता थी यह जानने की कि उसके बच्चे ने इस तरह की तहजीब आख़िर सीखी कहां से! वापसी में घर जाते हुए मां ने बच्चे से पूछा कि उसने टाफ़ियां ख़ुद क्यों नहीं निकालीं, तो बच्चे ने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया, ‘मां, तुमने ध्यान नहीं दिया, अगर मैं अपने छोटे-से हाथ से टाफ़ियां लेता, तो आख़िर कितनी आ पातीं! लेकिन चाचाजी ने अपनी मुट्ठी में भरकर टाफ़ियां दीं, तो मेरी दोनों जेबें भर गईं।’
सबक़ 
जब हम ख़ुद लेते हैं, ख़ुद कोई इच्छा करते हैं, तो हमें अपेक्षाकृत कम ही मिलता है। लेकिन जब भगवान देता है, तो हमारी झोली उम्मीद से भी ज्यादा भर जाती है

पाठशाला

नौजवान जब बच्चा लग रहा था

रेलगाड़ी अपनी पूरी ऱफ्तार से दौड़ रही थी। डिब्बे में बैठा कोई यात्री किताब पढ़ रहा था, कोई कुछ खा रहा था, तो कुछ लोग खिड़की से बाहर निहार रहे थे। खिड़की के पास बैठा एक पिता और उसका पुत्र जाने-अनजाने में सबका ध्यान खींच रहे थे। पुत्र की आयु 24-25 बरस की होगी। चेहरे से वह पढ़ा-लिखा और बुद्धिमान नजर आ रहा था। लेकिन उसकी गतिविधियां देखकर हर कोई हैरान था, सिवाय उसके पिता के।
वह नौजवान लगातार खिड़की से बाहर के नजारों का वर्णन किए जा रहा था। कभी वह पिता की बांह झिंझोड़कर कहता- पापा, देखिए, कितना हरा-भरा पेड़ है। कभी कहता- वाह! वह कौआ कितना काला है! कुछ आगे नदी देखकर वह बच्चों की तरह मचलने लगा- पापा-पापा, नदी का पानी कितना साफ़-स्वच्छ नजर आ रहा है! कभी वह आसमान में उमड़ते बादलों को देखकर ख़ुश होता, तो कभी चिड़ियों के झुंड को देखकर चहकने लगता। 
उसे तो काली-सफ़ेद-भूरी गायों का झुंड भी बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था। उस नौजवान को देखकर कोई मुस्करा कर आगे बढ़ जाता, तो कोई उसके पिता को सहानुभूति की दृष्टि से देखता। एकाध ने तो उसकी तरफ़ इशारा करके उसका उपहास भी उड़ा दिया। हालांकि पिता को तो जैसे इस सब की कोई परवाह ही नहीं थी। वह अपने बेटे की ख़ुशी में और ख़ुश हो रहा था। आख़िर एक सहयात्री से रहा नहीं गया। वह कह ही बैठा, ‘भाईसाहब, लगता है आपके पुत्र को कोई मानसिक समस्या है।’ पिता ने बग़ैर बुरा माने जवाब दिया, ‘दरअसल, पांच साल की उम्र में इसकी आंखों की रोशनी चली गई थी और कल ही ऑपरेशन के बाद इसने दुनिया को दुबारा देखना शुरू किया है।’
सबक : 
किसी का भी व्यवहार उसकी परिस्थितियों से संचालित होता है। इसलिए किसी के काम पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देने से पहले जान लें कि उसकी पृष्ठभूमि क्या है
बनावटी जीवन से बचकर रहें
मध्यम उम्र की एक महिला को दिल का दौरा पड़ने पर तत्काल अस्पताल ले जाया गया। ऑपरेशन की टेबल पर मानो उसे बिल्कुल नजदीक से मौत का एहसास हुआ। भगवान को देखकर उसने पूछा,‘हे, भगवान, क्या मेरा अब अंतिम व़क्त आ गया है?’
भगवान ने कहा, ‘नहीं, अभी तो तुम्हारे पास 43 साल, दो महीने और आठ दिन शेष हैं जीने के लिए।’ बहरहाल, उसका ऑपरेशन अच्छी तरह हुआ और वह पूरी तरह ठीक भी हो गई।
लेकिल ठीक होने के बावजूद वह महिला अपने घर जाने के लिए तैयार नहीं थी। उसने अस्पताल में ही रहने का निश्चय किया। फिर अस्पताल में ही उसने अपने चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी कराई और अपने चेहरे-मोहरे, होठों आदि को सही कराया। फिर अपने पेट पर चढ़ गई अतिरिक्त चर्बी को हटवाया। इस तरह उसे अपने शरीर में के अंग-अंग में जहां-जहां कोई कमी-खामी दिख रही थी, वह सब ठीक कराई। यहां तक कि उसने अपने बालों के रंग को भी बदलने के लिए किसी को बुला रखा था।
जाहिर है, उसके पास जीने के लिए काफ़ी व़क्त था, इसलिए उसने अपने आप को काफी अच्छी तरह से मेंटेन कर लिया। इस तरह अंतिम ऑपरेशन के बाद उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।
लेकिन घर के लिए जाते व़क्त रोड क्रॉस करते समय एंबुलेंस की टक्कर में उसकी मौत हो गई। अब भगवान के सामने आने पर उसने कहा, ‘भगवान आपने कहा था कि अभी मेरे पास जीने के लिए 40 साल और हैं?’ इस पर भगवान ने उससे कहा, ‘मैंने आपको नहीं पहचाना।’
सबक़
सच बात यही है कि क़ुदरत ने आपको जो रंग-रूप, आकार-प्रकार दिया है, वही सच है। बनावटी जीवन आपके लिए ख़तरा बन सकता है। और आप अपनी पहचान भी खो सकते हैं।

बहादुर योद्धा को ऐसा क्यों लगा

एक बहुत नामी योद्धा था। उसने कई युद्धों में अपने जौहर दिखाए थे। उसे अपनी बहादुरी का बहुत गर्व भी था। एक दिन वह एक संत से मिलने पहुंचा। संत का बहुत नाम था। उनके आश्रम में दूर-दूर से भक्त पहुंचते थे। योद्धा ने जैसे ही आश्रम में प्रवेश किया और उसने संत की कीर्ति देखी, अचानक उसे अपनी हीनता का एहसास होने लगा।
योद्धा के लिए यह बिल्कुल अजूबी भावना थी कि वह तुच्छ महसूस करे। उसने संत से पूछा, ‘आख़िर क्यों मुझे अपने छोटेपन का एहसास होने लगा है? मैंने कई बार मौत का सामना किया, पर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा। पर अभी आख़िर क्यों?’ संत ने जवाब दिया, ‘प्रतीक्षा करो। जब सब चले जाएंगे, तब मैं तुम्हें बताऊंगा।’
श्रद्धालु सारे दिन आते रहे और इंतजार करता हुआ योद्धा अंतत: थककर चूर हो गया। शाम ढली, रात आई। अब संत के आसपास कोई नहीं था। योद्धा ने पूछा, ‘क्या अब आप मुझे मेरे सवाल का जवाब दे सकते हैं?’ संत बोले, ‘आओ, कमरे से बाहर चलें।’
संत ने कहा, ‘यह देखो। यह लंबा वृक्ष है और उसकी बग़ल में यह छोटा पेड़। ये दोनों बरसों से मेरी खिड़की के पास जमे हुए हैं और उन्हें कभी कोई समस्या नहीं हुई।
छोटे पेड़ ने बड़े से कभी नहीं पूछा कि मैं आपसे छोटा क्यों महसूस करता हूं। मैंने उसकी कोई आवाज नहीं सुनी। बता सकते हो क्यों?’ योद्धा बोल पड़ा, ‘क्योंकि वे आपस में तुलना नहीं करते।’ संत ने कहा, ‘फिर तुम्हें मुझसे पूछने की जरूरत नहीं है। तुम जवाब जानते हो।’
सबक़
हर किसी की अपनी एक हस्ती होती है। जब हम तुलना करेंगे, तो हर मामले में कोई न कोई हमसे बेहतर होगा ही और यह जान हम दुखी हो जाएंगे। तुलना ही दुख की जड़ है।

क्या कहा गया और क्या अर्थ था

एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ियां आ-जा रही थीं। रास्ता बहुत घुमावदार था। अगले मोड़ से आगे क्या है, वाहन चालकों को कुछ अंदाज ही न हो पा रहा था। ऐसे में लोग न सिर्फ़ धीरे-धीरे गाड़ी चला रहे थे, बल्कि अन्य सावधानियां भी रख रहे थे। आने-जाने वाले वाहन चालक भी जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे से सूचनाएं साझा कर लेते थे।
ऐसे में, पहाड़ के ऊपर की तरफ़ से आती एक कार के ड्राइवर ने चलती गाड़ी की खिड़की से मुंह निकाला और नीचे से ऊपर की ओर जा रही गाड़ी के ड्राइवर की ओर देखते हुए जोर से चिल्लाया- ‘सुअर!’ उसने ऐसा पीछे की ओर आती गाड़ी को देखकर भी किया। यह सुनते ही अगले ड्राइवर की त्यौरियां चढ़ गईं।
उसे हैरानी हुई कि बग़ैर किसी कारण के उसे सुअर कहा गया और हैरानी से भी बढ़कर ग़ुस्सा आया। सो, उसने भी तत्काल खिड़की से सिर बाहर निकाला और चीख़ पड़ा- ‘कुत्ता।’
तब तक दोनों एक-दूसरे के पास से गुजर चुके थे। पहाड़ी रास्ता था। बीच में गाड़ी रोकी भी नहीं जा सकती थी। ‘सुअर’ सुनने वाले ड्राइवर को अब भी आश्चर्य हो रहा था कि उसे बेवजह ऐसा क्यों कहा गया। फिर उसने सोचा कि ऐसा करना उसकी आदत होगी, क्योंकि उसने पीछे आ रही गाड़ी के ड्राइवर के लिए भी यही कहा था।
उसने सोचा, दुनिया में भी अजीब लोग होते हैं। वह ऐसा सोचते हुए जा रहा था कि अचानक झाड़ियों से निकलकर एक सुअर सड़क पर आ गया और उसकी गाड़ी से टकराते-टकराते बचा। तब उसे समझ में आया कि उस ड्राइवर ने उसे सुअर कहकर गाली नहीं दी थी, बल्कि चेताया था।
सबक : 
किसी के शब्दों पर नहीं, उसकी भावनाओं पर ध्यान दें। शब्द और लहजा रूखा हो सकता है, लेकिन प्रतिक्रिया से पहले देख लें कि उन शब्दों का उद्देश्य हमारी ही भलाई तो नहीं।

एक और नई शुरुआत करें

अमरीका के थॉमस अल्वा एडिसन इतिहास के सबसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों में शुमार होते हैं, जिनके बनाए बिजली के बल्ब ने पूरी दुनिया को नई रोशनी दी। एडिसन के नाम अकेले अमरीका में ही 1,093 आविष्कारों के पेटेंट हैं।
यह 1914 के दिसंबर महीने की बात है। एडिसन की फैक्टरीनुमा प्रयोगशाला में आग लग गई और वह लगभग पूरी तरह से तबाह हो गई। एडिसन के 24 वर्षीय बेटे चाल्र्स को ध्यान आया कि उसके पिता कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। वह धुएं और उड़ती राख़ के बीच उन्हें पागलों की तरह तलाश रहा था।
आख़िर उसने उन्हें, अपने पिता थॉमस अल्वा एडिसन को खोज निकाला। लपटों की रोशनी में उनका चेहरा चमक रहा था। वे तब 67 साल के थे। जवानी उनसे बहुत दूर जा चुकी थी। और हर चीÊा आग की भेंट चढ़ चुकी थी।
चाल्र्स को देखते ही एडिसन चिल्लाए, ‘चाल्र्स तुम्हारी मां कहां हैं?’
चाल्र्स ने जब बताया कि उसे नहीं मालूम, तो उन्होंने कहा, ‘उन्हें ढूंढ़ कर यहां ले आओ। तुम्हारी मां ने अपने पूरे जीवन में ऐसा नÊारा नहीं देखा होगा!’
अगली सुबह तक आग की लपटें ठंडी हो गईं, पर उससे पहले सबकुछ बर्बाद कर गई थीं। फैक्टरी की खंडहर हो चुकी इमारत को देखते हुए एडिसन बोले, ‘ऐसी तबाही का भी बहुत महत्व है। हमारी सारी ग़लतियां जलकर खाक हो जाती हैं। भगवान का शुक्र है कि अब हम नई शुरुआत कर सकते हैं।’
और इस भीषण अग्निकांड के महज तीन ह़फ्ते बाद ही एडिसन ने फोनोग्राफ का आविष्कार कर दिखाया।

सबक 
जो बीत गया, चला गया, उसका दुख मनाने से क्या फ़ायदा? हर दिन एक नया दिन होता है और किसी भी दिन, किसी भी आयु में, किसी भी परिस्थिति में जीवन की नई शुरुआत हो सकती है

मां से छुपाओगे तो कहां जाओगे

महानगरों की बात है, जहां आवास समस्या के चलते किसी लड़के और लड़की द्वारा फ्लैट साझा करने की बात ज्यादा अजीब नहीं समझी जाती। ऐसे में एक मां अपने बेटे से मिलने पहुंची थी, जो फ्लैट में एक लड़की के साथ ‘अलग-अलग’ रहता था। बेटे ने मां की बड़ी आवभगत की। मां ने देखा कि लड़की बड़ी ख़ूबसूरत है और उसके व बेटे के बीच आंखों-आंखों में ही काफ़ी बातें हो रही हैं।
मां क़स्बे से आई थी। उसे पहले से ही शक था। जब बेटे ने मां की निगाहों में संदेह देखा, तो उसने ख़ुद ही सफ़ाई दे दी कि तुम जैसा सोच रही हो, वैसा कुछ भी नहीं है। हम सिर्फ़ रसोई साझा कर रहे हैं, रहते अलग-अलग हैं। ख़ैर, मां ने कुछ नहीं पूछा और वह अगले दिन लौट आई। उसके लौटने के बाद लड़की ने ध्यान दिया कि रसोई में रखा चांदी का जार ग़ायब है। उसने यह बात लड़के से कही।
लड़के ने पहले तो कहा कि मां ऐसा नहीं कर सकतीं। लेकिन चूंकि घर में और कोई नहीं आया था, इसलिए उसने मां को ई-मेल किया- ‘प्रिय मां, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम जार ले गई हो। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि तुम जार नहीं ले गई हो। पर सच यह है कि जार यहां से ग़ायब है।’ कुछ दिनों बाद उसे ई-मेल से ही मां का जवाब मिला- ‘प्रिय बेटे, मैं यह नहीं कह रही हूं कि तुम दोनों एक ही कमरे में रहते हो।
मैं यह भी नहीं कह रही हूं कि तुम लोग अलग-अलग कमरों में रहते हो। पर वास्तविकता यह है कि अगर तुम्हारी दोस्त अपने कमरे में रहती, तो उसे तुरंत पता चल जाता कि जिस जार को तुम लोग ग़ायब समझ रहे हो, वह उसके तकिए के नीचे रखा हुआ है।
’
सबक
मां से कुछ भी नहीं छुपा है। मां से कुछ छुपाना भी नहीं चाहिए। बच्चे की सबसे अच्छी दोस्त मां होती है, इसलिए कोई दुविधा है, तो मां को वह बात बता देनी चाहिए।