Tuesday, September 21, 2010

पाठशाला



कौन हंसता है कौन रोता है.

एक आदमी साइकोलॉजिस्ट से मशविरा लेने आया था। वह अपनी बारी के इंतज़ार में चेंबर के बाहर बैठा था। उसकी शक्ल से ही लग रहा था कि वह महादुखी मानव है। चेहरा लटका हुआ, होंठों पर हंसी का एक निशान तक न था।वह औरों से बोलना तो दूर, उनकी तरफ़ देख भी नहीं रहा था। कुछ देर बाद उसका भी नंबर आया। साइकोलॉजिस्ट अनुभवी था। वह उसे देखते ही पहचान गया कि यह अवसाद का केस है। फिर भी उसने समस्या पूछी। आदमी ने बोलना शुरू किया,‘डॉक्टर साहब, मैं हमेशा हताशा में ही डूबा रहता हूं। चाहे कुछ भी कर लूं, मन में उत्साह जागता ही नहीं।  

अब आप ही बताएं कि मैं क्या करूं!’ मनोचिकित्सक ने कहा, ‘मेरे साथ उस खिड़की तक आओ।’ जब वह उसके पीछे वहां तक पहुंचा, तो मनोचिकित्सक ने खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, ‘तुम दूर वो तंबू देख रहे हो? वह सर्कस का तंबू है। मैंने वह सर्कस देखा है, बहुत शानदार है। वहां तुम्हें ढेर सारे करतब देखने को मिलेंगे,ख़ासतौर पर एक जोकर के कारनामे देखकर तो हंस-हंस कर लोट-पोट हो जाओगे। वह जब तक तुम्हारी नज़रों के सामने रहेगा, तुम हंसी नहीं रोक पाओगे। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं कि एक बार उस जोकर की कलाकारी देख लेने के बाद अवसाद ज़िन्दगी में दुबारा तुम्हारे पास नहीं फटकेगा।’
यह सब सुनकर भी उस आदमी के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं आई। उसका लटका मुंह देखकर साइकोलॉजिस्ट ने कहा, ‘तुम वहां जाकर तो देखो।’ वह आदमी बोला, ‘साहब, वह जोकर मैं ही हूं।’  

सबक: इस दुनिया में हर कोई अभिनय कर रहा है। हंसी-मजाक की ओट में कोई ग़म छिपा रहा है, तो कोई बेवजह आंसू बहाकर औरों से सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है

सिक्का उछाल जान लो भाग्य

राजा को गुप्तचरों ने सूचना दी कि पड़ोसी राज्य की सेनाएं उस राज्य पर धावा बोलने के लिए निकल चुकी हैं। उसने सेनापति को उन्हें राज्य की सीमा पर रोक देने का आदेश दिया। सेनापति अपनी सफलता को लेकर आश्वस्त था, क्योंकि उनके पास कहीं ज्यादा बड़ी सेना थी। लेकिन उसके सैनिकों को अपनी जीत पर संदेह था।सेनापति ने कई तरह से समझाया, दोनों सेनाओं की तुलना के ढेर सारे तथ्य बताए, पर सैनिकों के मन में अकारण बैठ गया था कि हमारी हार ही होनी है। बावजूद इसके सेनापति सेना लेकर निकल पड़ा, पड़ोसी सेना को सीमा पर ही रोक देने के लिए। रास्ते में एक मंदिर था। परंपरा के अनुसार वे वहां पूजा के लिए रुके। सैनिकों ने अपनी जीत की कामना की, पर उन्हें अब भी जीत का भरोसा नहीं था।  

तभी सेनापति ने अपने सैनिकों को संबोधित करना शुरू किया। उसने कहा, ‘हम यह सिक्का उछालकर देखेंगे कि नियति में क्या लिखा है। अगर चित आया, तो हमारी जीत होगी और पट आया, तो हार।’ सैनिक उत्सुकता से देखने लगे। सेनापति ने सिक्का उछाला और यह चित था। सैनिकों में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी।  

कहना न होगा कि उन्होंने पड़ोसी राज्य की सेना को न सिर्फ़ अपनी सीमा पर रोक दिया, बल्कि काफ़ी दूर तक खदेड़ भी आए। बाद में एक युवा सैनिक ने सेनापति से कहा, ‘सचमुच, जो नियति में लिखा होता है, वही होता है।’ सेनापति ने जवाब देने की बजाय उसे वह सिक्का दिखा दिया। उस सिक्के के दोनों तरफ़ चित वाला ही निशान था। फिर क्या था, सेनापति वहीं अपना माथा पकड़कर बैठ गया। 

सबक : भाग्य में जो लिखा है, वह तो होगा ही, लेकिन भाग्य में क्या लिखा, यह नियति रचने वाले, यानी ईश्वर के अलावा और कोई भी सही-सही नहीं बता सकता

प्रोत्साहित करने की ताक़त.

एक बार एक वृद्ध व्यक्ति 19 वीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार दांते गैब्रियल रोसिटी के पास पहुंचा। उस वृद्ध व्यक्ति के पास कुछ स्केच और कलाकृतियां थीं, जिन्हें वह रोसिटी को दिखाना चाहता था, जिससे वह जान सके कि ये पेंटिंग कैसी हैं और कम से कम इनके माध्यम से टैलेंट का पता चल जाए। रोसिटी ने उन्हें बड़े ध्यान से देखा।  

शुरुआत की कुछ कलाकृतियां, जिनमें जरा सा भी कला प्रेम नहीं दिख रहा था, रोसिटी को बेकार लगीं, लेकिन वह एक दयालु आदमी था, इसलिए उसने बड़े ही उदार भाव से कहा कि इन तस्वीरों में योग्यता नजर नहीं आती। ऐसा कहते हुए रोसिटी दुखी हुए, लेकिन उस आदमी से झूठ नहीं बोल सकते थे। वह वृद्ध व्यक्ति दुखी था, लेकिन उसे रोसिटी के निर्णय का इंतजार था। उसने रोसिटी से उसका समय लेने के लिए माफी मांगी और उसे कुछ और कलाकृतियां दिखाई। इन्हें एक स्टूडेंट ने बनाया था।  

रोसिटी ने जब इन स्केच को देखा, तो वह उन्हें देखकर खुशी से झूम उठा। उसने कहा, ये तो बहुत अच्छी है। इन्हें बनाने वाले स्टूडेंट में बहुत प्रतिभा है। एक कलाकार के रूप में उसके करियर को मदद और प्रोत्साहन देने के लिए उसकी हर संभव मदद करनी चाहिए। अगर वह इसी क्षेत्र में रहकर मेहनत करता है, तो इसका भविष्य बहुत अच्छा है। रोसिटी ने देखा कि वह बूढ़ा आदमी काफ़ी उदास था।  

रोसिटी ने उससे पूछा, यह बेहतरीन कलाकार क्या तुम्हारा बेटा है? उस बूढ़े आदमी ने दुखी होकर यह कहा। यह मैं हूं-आज से चालीस साल पहले। काश, यह मैंने पहले आप की यह तारीफ सुनी होती। हतोत्साहित होकर सालों पहले मैंने यह काम छोड़ दिया।

बनावटी जीवन से बचकर रहें

मध्यम उम्र की एक महिला को दिल का दौरा पड़ने पर तत्काल अस्पताल ले जाया गया। ऑपरेशन की टेबल पर मानो उसे बिल्कुल नजदीक से मौत का एहसास हुआ। भगवान को देखकर उसने पूछा,‘हे, भगवान, क्या मेरा अब अंतिम व़क्त आ गया है?’  

भगवान ने कहा, ‘नहीं, अभी तो तुम्हारे पास 43 साल, दो महीने और आठ दिन शेष हैं जीने के लिए।’ बहरहाल, उसका ऑपरेशन अच्छी तरह हुआ और वह पूरी तरह ठीक भी हो गई।  

लेकिल ठीक होने के बावजूद वह महिला अपने घर जाने के लिए तैयार नहीं थी। उसने अस्पताल में ही रहने का निश्चय किया। फिर अस्पताल में ही उसने अपने चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी कराई और अपने चेहरे-मोहरे, होठों आदि को सही कराया। फिर अपने पेट पर चढ़ गई अतिरिक्त चर्बी को हटवाया। इस तरह उसे अपने शरीर में के अंग-अंग में जहां-जहां कोई कमी-खामी दिख रही थी, वह सब ठीक कराई। यहां तक कि उसने अपने बालों के रंग को भी बदलने के लिए किसी को बुला रखा था।  

जाहिर है, उसके पास जीने के लिए काफ़ी व़क्त था, इसलिए उसने अपने आप को काफी अच्छी तरह से मेंटेन कर लिया। इस तरह अंतिम ऑपरेशन के बाद उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।

लेकिन घर के लिए जाते व़क्त रोड क्रॉस करते समय एंबुलेंस की टक्कर में उसकी मौत हो गई। अब भगवान के सामने आने पर उसने कहा, ‘भगवान आपने कहा था कि अभी मेरे पास जीने के लिए 40 साल और हैं?’ इस पर भगवान ने उससे कहा, ‘मैंने आपको नहीं पहचाना।’ 

सबक़ सच बात यही है कि क़ुदरत ने आपको जो रंग-रूप, आकार-प्रकार दिया है, वही सच है। बनावटी जीवन आपके लिए ख़तरा बन सकता है। और आप अपनी पहचान भी खो सकते हैं






 

Friday, September 17, 2010

अनुभव

मुसकराहट या सोच 

क्या वाकई अमीर 
एक दिन मोहन ने सोचन से कहा मेरा भाई रो पाच बार कपडे बदलता हैं सोहन ने हेरानी से मान लिया और कहा फिर तो बहुत अमीर होगा फिर मोहन ने बताया नहीं यार अमीर नहीं दरअसल अभी वो सात महीने का हैं 
इसीलिए 
किसी भी तथ्य के पहले सारे पहलु को जाने फिर उसकी सच्चाई का फैसला करे 
माँ बाप 
दो दोस्त होटल में खाना खा रहे थे पहला दुसरे से बोला यार तुम मेरी माँ बन जाओ और अपने  हाथ से मेरी प्लेट में परोसते जाओ दुसरे ने वैसा ही किया खाना खाने के बाद दूसरा पहले से बोला ऐसा करो अब तुम मेरे बाप बन जाओ और बिल अदा करो 
इसलिए 
ये मान कर चले की जब कोई सुविधा मिलेगी , तो देर सवेरे उसका मूल्य भी चुकाना पड़ेगा 
जानकारी और बुद्धि 
जानकारी से पता चलता हे की टमाटर सब्जी नहीं फल हे बुद्धि से पता चलता हे की इसे फ्रूट  सलाद में नहीं मिलाना हे 
इसलिए 
विभिन्न विषयो में ढेर सारी  जानकारी रकना अकलमंदी नहीं हैं बल्कि सामान्य बुद्धि ही काफी हैं 
अंत में कौन गलत 
हर महिला तब तक गलत होती ह्रीं जब तक की वो रोये नहीं और रोने के बाद तत्काल सही हो जाती हैं
 इसलिए 
आप बताये आप का अनुभव क्या कहता हैं अगर आप पति हैं तो आपको हर बार गलत बात माननी ही पड़ेगी  
 डरे नहीं खुश  रहे 
रात में कई बार अपनी ही या दूसरे की परछाइयो को देख कर दर लगने लगता हैं पर इसका मतलब ये नहीं की कोई हैं बल्कि कही दूसरी ओर रोशनी भी होती हैं   
इसलिए 
हमेशा निराशा हताशा की घडी में सकारात्मक पहलू भी होता हैं  
  उछलकूद नहीं काम की बात हो 
जंगल में चुनाव हुआ बहुमत के कारण बन्दर राजा बन गया शेर अपनी हार के गुस्से के कारण एक बकरी के मेमने को उठा कर ले गया बकरी ने बन्दर राजा से गुहार लगाईं की महाराज मेरे बच्चे को बचा लो  बकरी की बात सुन कर बन्दर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर उछल कूद करने लगा बकरी बोली सरकार देर मत करो ऐसे में तो शेर मेरे बच्चे को खा जाएगा बन्दर ने घुड़कते हुए कहा वह तो शेर जाने पर मेरी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बता 
इसीलिए
भागदौड़ नहीं काम और परिणाम जरुरी हैं 

पाठशाला

खोल से बाहर निकालने का तरीक़ा

जाड़े के दिन थे। एक छोटे बच्चे को कहीं पर एक छोटा कछुआ मिल गया। कछुआ अपनी राह जा रहा था। बच्चे ने उसे देखा, तो हाथों में उठा लिया। उसका स्पर्श पाते ही कछुआ अपने स्वभाव के अनुरूप तुरंत खोल में घुस गया। बच्चे ने लाख कोशिश कर ली, पर उसने मुंह और हाथ-पैर बाहर नहीं निकाले। उसने उन्हें बाहर खींचने की कोशिश की, लकड़ी से कुरेदा, पर कछुआ टस से मस न हुआ। हारकर वह बच्च उसे अपने घर ले आया। उसका ख्याल था कि घर में कछुआ कभी तो खोल से बाहर निकलेगा। लेकिन वहां वह चेहरा जरा सा बाहर निकालता और आसपास देखते ही फिर अंदर कर लेता। बच्चे ने उसके सामने खाना-पानी रखा, पर कोई असर न हुआ। 
बच्च बड़ी देर तक इंतजार करता रहा। उसके चाचा उसे लगातार देख रहे थे। आख़िरकार वे बोले, ‘कछुआ भले ही मर जाएगा, पर इस तरह से खोल से बाहर नहीं आएगा। आओ, मैं तुम्हें बताता हूं, उसे बाहर निकालने का सही तरीक़ा क्या है।’ चाचा ने कछुए को उठाया और उसे अंगीठी के पास रख दिया। जाड़े के दिन थे। कछुए को थोड़ी गर्मी का एहसास हुआ, तो उसने पहले सिर निकाला और फिर धीरे से हाथ-पैर भी बाहर निकाल लिए। 
बच्च हैरान था कि यह कैसे हो गया। जिस काम के लिए वह घंटे भर से कोशिश कर रहा था फिर भी नाकामयाब रहा, वह पांच मिनट में हो गया। चाचा ने उसे बताया, ‘कछुए ऐसे ही खोल से बाहर आते हैं और इंसान भी। आप उनसे जबरदस्ती कुछ नहीं करा सकते। पहले आपको उन्हें दयालुता के साथ गर्मजोशी देनी पड़ती है, तभी वे आपसे खुलते हैं।’ 
सबक़ 
लोगों को आप जितना भी खिला-पिला लें, घर ले जाएं, आव-भगत कर लें, पर वे तब तक आपसे नहीं खुलेंगे, जब तक कि उनसे गर्मजोशी व आत्मीयता का व्यवहार 
न किया जाए




पालतू मछलियां वापस आएंगी क्या

एक आदमी को मछलियां पकड़ने का बहुत शौक़ था। वह जहां भी जाता, झील या तालाब जरूर खोजता। एक बार वह किसी अनजान शहर में झील किनारे बैठकर मछलियां पकड़ रहा था। वह मछलियां पकड़कर पानी भरी बाल्टी में डालता जाता। जब बाल्टी में ढेर सारी मछलियां तैरने लगीं, तो वह होटल वापस जाने के लिए उठा। इसी समय एक सरकारी कर्मचारी ने उसका रास्ता रोक लिया। कर्मचारी ने रोब दिखाते हुए कहा, ‘क्या आप नहीं जानते कि इस झील पर मछलियां पकड़ना मना है?’
आदमी ने जवाब दिया, ‘नहीं, यहां ऐसा कोई बोर्ड भी नहीं लगा है।’ यह सुनकर कर्मचारी की बांछें खिल गईं। उसने अपना मुंह सटाते हुए कहा, ‘चिंता मत कीजिए, मैं आपका ज्यादा नुक़सान नहीं होने दूंगा। यहां मछली पकड़ने का फ़ाइन सौ रुपए है, पर आप तो मुझे दस ही दे दीजिए और आराम से निकल जाइए।’
अब उस आदमी को ग़ुस्सा आया। पर उसने शांति से कहा, ‘मछली पकड़ना मना है..पर मैं तो अपनी पालतू मछलियों को घुमाने लाया था। मैं रोज उन्हें किसी झील, तालाब या पोखर में छोड़ देता हूं और कुछ समय बाद जब सीटी बजाता हूं, तो वे वापस आ जाती हैं।’
कर्मचारी को उसकी बात पर जरा भी यक़ीन नहीं हुआ। उसने व्यंग्य से कहा, ‘अच्छा! जरा मेरे सामने ऐसा करके तो दिखाइए।’ उस आदमी को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। उसने पूरी बाल्टी झील में उलट दी। और वापस जाने लगा। कर्मचारी ने उसे रोका, बोला, ‘मछलियों को वापस तो बुलाओ!’ उस आदमी ने जवाब दिया, ‘कैसी मछलियां? मैं तो यहां ख़ाली हाथ, झील के किनारे टहलने आया था!’
सबक़
जैसे को तैसा जरूरी है। अगर कोई बेईमान, ग़लत काम या भ्रष्टाचार के लिए बाध्य करे, तो उसे बेवकूफ़ बनाने के लिए दिमाग़ लगा कर थोड़ा झूठ बोल देने में बुराई नहीं है।

ख़ुद निकाल लो या इंतजार करो

एक बच्चा अपनी मां के साथ किसी रिश्तेदार के घर गया हुआ था। बच्च बड़ा प्यारा था। रिश्तेदार ने जब मां को चाय बनाकर दी, तो बच्चे को भी कुछ देना जरूरी था। सो, वह टाफ़ियों से भरा मर्तबान ले आया। उसने ढक्कन खोलकर बच्चे से कहा, ‘बेटे, इसमें से जितनी चाहो, टाफ़ियां ले लो।’
और कोई बच्च होता, तो ख़ुश होकर तुरंत मर्तबान में हाथ डाल देता, पर इस बच्चे ने कुछ नहीं किया, चुपचाप खड़ा रहा। रिश्तेदार ने दुबारा कहा और मर्तबान उसके थोड़ा और पास ले गया। लेकिन बच्च टाफ़ियों को देखता रह गया, पर उसने हाथ नहीं बढ़ाया। अब तो अजीब स्थिति हो गई। न तो मेजबान ने, न मां ने सोचा था कि वह ऐसी बात करेगा।
मां जानती थी कि बच्चे को टाफ़ियां बहुत पसंद हैं, इसलिए उसे और ज्यादा हैरानी हो रही थी। मां को लगा कि बच्च रिश्तेदार के सामने झिझक रहा है, इसलिए इस बार उसने ख़ुद कहा कि बेटे टाफ़ियां निकाल लो। लेकिन बच्चे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, वह वैसे ही खड़ा रहा।
आख़िर रिश्तेदार ने एक मुट्ठी टाफ़ियां निकालीं और उन्हें बच्चे की दोनों जेबों में डाल दिया। बच्च ख़ुश। अब मां को बेहद उत्सुकता थी यह जानने की कि उसके बच्चे ने इस तरह की तहजीब आख़िर सीखी कहां से! वापसी में घर जाते हुए मां ने बच्चे से पूछा कि उसने टाफ़ियां ख़ुद क्यों नहीं निकालीं, तो बच्चे ने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया, ‘मां, तुमने ध्यान नहीं दिया, अगर मैं अपने छोटे-से हाथ से टाफ़ियां लेता, तो आख़िर कितनी आ पातीं! लेकिन चाचाजी ने अपनी मुट्ठी में भरकर टाफ़ियां दीं, तो मेरी दोनों जेबें भर गईं।’
सबक़ 
जब हम ख़ुद लेते हैं, ख़ुद कोई इच्छा करते हैं, तो हमें अपेक्षाकृत कम ही मिलता है। लेकिन जब भगवान देता है, तो हमारी झोली उम्मीद से भी ज्यादा भर जाती है

पाठशाला

नौजवान जब बच्चा लग रहा था

रेलगाड़ी अपनी पूरी ऱफ्तार से दौड़ रही थी। डिब्बे में बैठा कोई यात्री किताब पढ़ रहा था, कोई कुछ खा रहा था, तो कुछ लोग खिड़की से बाहर निहार रहे थे। खिड़की के पास बैठा एक पिता और उसका पुत्र जाने-अनजाने में सबका ध्यान खींच रहे थे। पुत्र की आयु 24-25 बरस की होगी। चेहरे से वह पढ़ा-लिखा और बुद्धिमान नजर आ रहा था। लेकिन उसकी गतिविधियां देखकर हर कोई हैरान था, सिवाय उसके पिता के।
वह नौजवान लगातार खिड़की से बाहर के नजारों का वर्णन किए जा रहा था। कभी वह पिता की बांह झिंझोड़कर कहता- पापा, देखिए, कितना हरा-भरा पेड़ है। कभी कहता- वाह! वह कौआ कितना काला है! कुछ आगे नदी देखकर वह बच्चों की तरह मचलने लगा- पापा-पापा, नदी का पानी कितना साफ़-स्वच्छ नजर आ रहा है! कभी वह आसमान में उमड़ते बादलों को देखकर ख़ुश होता, तो कभी चिड़ियों के झुंड को देखकर चहकने लगता। 
उसे तो काली-सफ़ेद-भूरी गायों का झुंड भी बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था। उस नौजवान को देखकर कोई मुस्करा कर आगे बढ़ जाता, तो कोई उसके पिता को सहानुभूति की दृष्टि से देखता। एकाध ने तो उसकी तरफ़ इशारा करके उसका उपहास भी उड़ा दिया। हालांकि पिता को तो जैसे इस सब की कोई परवाह ही नहीं थी। वह अपने बेटे की ख़ुशी में और ख़ुश हो रहा था। आख़िर एक सहयात्री से रहा नहीं गया। वह कह ही बैठा, ‘भाईसाहब, लगता है आपके पुत्र को कोई मानसिक समस्या है।’ पिता ने बग़ैर बुरा माने जवाब दिया, ‘दरअसल, पांच साल की उम्र में इसकी आंखों की रोशनी चली गई थी और कल ही ऑपरेशन के बाद इसने दुनिया को दुबारा देखना शुरू किया है।’
सबक : 
किसी का भी व्यवहार उसकी परिस्थितियों से संचालित होता है। इसलिए किसी के काम पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देने से पहले जान लें कि उसकी पृष्ठभूमि क्या है
बनावटी जीवन से बचकर रहें
मध्यम उम्र की एक महिला को दिल का दौरा पड़ने पर तत्काल अस्पताल ले जाया गया। ऑपरेशन की टेबल पर मानो उसे बिल्कुल नजदीक से मौत का एहसास हुआ। भगवान को देखकर उसने पूछा,‘हे, भगवान, क्या मेरा अब अंतिम व़क्त आ गया है?’
भगवान ने कहा, ‘नहीं, अभी तो तुम्हारे पास 43 साल, दो महीने और आठ दिन शेष हैं जीने के लिए।’ बहरहाल, उसका ऑपरेशन अच्छी तरह हुआ और वह पूरी तरह ठीक भी हो गई।
लेकिल ठीक होने के बावजूद वह महिला अपने घर जाने के लिए तैयार नहीं थी। उसने अस्पताल में ही रहने का निश्चय किया। फिर अस्पताल में ही उसने अपने चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी कराई और अपने चेहरे-मोहरे, होठों आदि को सही कराया। फिर अपने पेट पर चढ़ गई अतिरिक्त चर्बी को हटवाया। इस तरह उसे अपने शरीर में के अंग-अंग में जहां-जहां कोई कमी-खामी दिख रही थी, वह सब ठीक कराई। यहां तक कि उसने अपने बालों के रंग को भी बदलने के लिए किसी को बुला रखा था।
जाहिर है, उसके पास जीने के लिए काफ़ी व़क्त था, इसलिए उसने अपने आप को काफी अच्छी तरह से मेंटेन कर लिया। इस तरह अंतिम ऑपरेशन के बाद उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।
लेकिन घर के लिए जाते व़क्त रोड क्रॉस करते समय एंबुलेंस की टक्कर में उसकी मौत हो गई। अब भगवान के सामने आने पर उसने कहा, ‘भगवान आपने कहा था कि अभी मेरे पास जीने के लिए 40 साल और हैं?’ इस पर भगवान ने उससे कहा, ‘मैंने आपको नहीं पहचाना।’
सबक़
सच बात यही है कि क़ुदरत ने आपको जो रंग-रूप, आकार-प्रकार दिया है, वही सच है। बनावटी जीवन आपके लिए ख़तरा बन सकता है। और आप अपनी पहचान भी खो सकते हैं।

बहादुर योद्धा को ऐसा क्यों लगा

एक बहुत नामी योद्धा था। उसने कई युद्धों में अपने जौहर दिखाए थे। उसे अपनी बहादुरी का बहुत गर्व भी था। एक दिन वह एक संत से मिलने पहुंचा। संत का बहुत नाम था। उनके आश्रम में दूर-दूर से भक्त पहुंचते थे। योद्धा ने जैसे ही आश्रम में प्रवेश किया और उसने संत की कीर्ति देखी, अचानक उसे अपनी हीनता का एहसास होने लगा।
योद्धा के लिए यह बिल्कुल अजूबी भावना थी कि वह तुच्छ महसूस करे। उसने संत से पूछा, ‘आख़िर क्यों मुझे अपने छोटेपन का एहसास होने लगा है? मैंने कई बार मौत का सामना किया, पर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा। पर अभी आख़िर क्यों?’ संत ने जवाब दिया, ‘प्रतीक्षा करो। जब सब चले जाएंगे, तब मैं तुम्हें बताऊंगा।’
श्रद्धालु सारे दिन आते रहे और इंतजार करता हुआ योद्धा अंतत: थककर चूर हो गया। शाम ढली, रात आई। अब संत के आसपास कोई नहीं था। योद्धा ने पूछा, ‘क्या अब आप मुझे मेरे सवाल का जवाब दे सकते हैं?’ संत बोले, ‘आओ, कमरे से बाहर चलें।’
संत ने कहा, ‘यह देखो। यह लंबा वृक्ष है और उसकी बग़ल में यह छोटा पेड़। ये दोनों बरसों से मेरी खिड़की के पास जमे हुए हैं और उन्हें कभी कोई समस्या नहीं हुई।
छोटे पेड़ ने बड़े से कभी नहीं पूछा कि मैं आपसे छोटा क्यों महसूस करता हूं। मैंने उसकी कोई आवाज नहीं सुनी। बता सकते हो क्यों?’ योद्धा बोल पड़ा, ‘क्योंकि वे आपस में तुलना नहीं करते।’ संत ने कहा, ‘फिर तुम्हें मुझसे पूछने की जरूरत नहीं है। तुम जवाब जानते हो।’
सबक़
हर किसी की अपनी एक हस्ती होती है। जब हम तुलना करेंगे, तो हर मामले में कोई न कोई हमसे बेहतर होगा ही और यह जान हम दुखी हो जाएंगे। तुलना ही दुख की जड़ है।

क्या कहा गया और क्या अर्थ था

एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ियां आ-जा रही थीं। रास्ता बहुत घुमावदार था। अगले मोड़ से आगे क्या है, वाहन चालकों को कुछ अंदाज ही न हो पा रहा था। ऐसे में लोग न सिर्फ़ धीरे-धीरे गाड़ी चला रहे थे, बल्कि अन्य सावधानियां भी रख रहे थे। आने-जाने वाले वाहन चालक भी जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे से सूचनाएं साझा कर लेते थे।
ऐसे में, पहाड़ के ऊपर की तरफ़ से आती एक कार के ड्राइवर ने चलती गाड़ी की खिड़की से मुंह निकाला और नीचे से ऊपर की ओर जा रही गाड़ी के ड्राइवर की ओर देखते हुए जोर से चिल्लाया- ‘सुअर!’ उसने ऐसा पीछे की ओर आती गाड़ी को देखकर भी किया। यह सुनते ही अगले ड्राइवर की त्यौरियां चढ़ गईं।
उसे हैरानी हुई कि बग़ैर किसी कारण के उसे सुअर कहा गया और हैरानी से भी बढ़कर ग़ुस्सा आया। सो, उसने भी तत्काल खिड़की से सिर बाहर निकाला और चीख़ पड़ा- ‘कुत्ता।’
तब तक दोनों एक-दूसरे के पास से गुजर चुके थे। पहाड़ी रास्ता था। बीच में गाड़ी रोकी भी नहीं जा सकती थी। ‘सुअर’ सुनने वाले ड्राइवर को अब भी आश्चर्य हो रहा था कि उसे बेवजह ऐसा क्यों कहा गया। फिर उसने सोचा कि ऐसा करना उसकी आदत होगी, क्योंकि उसने पीछे आ रही गाड़ी के ड्राइवर के लिए भी यही कहा था।
उसने सोचा, दुनिया में भी अजीब लोग होते हैं। वह ऐसा सोचते हुए जा रहा था कि अचानक झाड़ियों से निकलकर एक सुअर सड़क पर आ गया और उसकी गाड़ी से टकराते-टकराते बचा। तब उसे समझ में आया कि उस ड्राइवर ने उसे सुअर कहकर गाली नहीं दी थी, बल्कि चेताया था।
सबक : 
किसी के शब्दों पर नहीं, उसकी भावनाओं पर ध्यान दें। शब्द और लहजा रूखा हो सकता है, लेकिन प्रतिक्रिया से पहले देख लें कि उन शब्दों का उद्देश्य हमारी ही भलाई तो नहीं।

एक और नई शुरुआत करें

अमरीका के थॉमस अल्वा एडिसन इतिहास के सबसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों में शुमार होते हैं, जिनके बनाए बिजली के बल्ब ने पूरी दुनिया को नई रोशनी दी। एडिसन के नाम अकेले अमरीका में ही 1,093 आविष्कारों के पेटेंट हैं।
यह 1914 के दिसंबर महीने की बात है। एडिसन की फैक्टरीनुमा प्रयोगशाला में आग लग गई और वह लगभग पूरी तरह से तबाह हो गई। एडिसन के 24 वर्षीय बेटे चाल्र्स को ध्यान आया कि उसके पिता कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। वह धुएं और उड़ती राख़ के बीच उन्हें पागलों की तरह तलाश रहा था।
आख़िर उसने उन्हें, अपने पिता थॉमस अल्वा एडिसन को खोज निकाला। लपटों की रोशनी में उनका चेहरा चमक रहा था। वे तब 67 साल के थे। जवानी उनसे बहुत दूर जा चुकी थी। और हर चीÊा आग की भेंट चढ़ चुकी थी।
चाल्र्स को देखते ही एडिसन चिल्लाए, ‘चाल्र्स तुम्हारी मां कहां हैं?’
चाल्र्स ने जब बताया कि उसे नहीं मालूम, तो उन्होंने कहा, ‘उन्हें ढूंढ़ कर यहां ले आओ। तुम्हारी मां ने अपने पूरे जीवन में ऐसा नÊारा नहीं देखा होगा!’
अगली सुबह तक आग की लपटें ठंडी हो गईं, पर उससे पहले सबकुछ बर्बाद कर गई थीं। फैक्टरी की खंडहर हो चुकी इमारत को देखते हुए एडिसन बोले, ‘ऐसी तबाही का भी बहुत महत्व है। हमारी सारी ग़लतियां जलकर खाक हो जाती हैं। भगवान का शुक्र है कि अब हम नई शुरुआत कर सकते हैं।’
और इस भीषण अग्निकांड के महज तीन ह़फ्ते बाद ही एडिसन ने फोनोग्राफ का आविष्कार कर दिखाया।

सबक 
जो बीत गया, चला गया, उसका दुख मनाने से क्या फ़ायदा? हर दिन एक नया दिन होता है और किसी भी दिन, किसी भी आयु में, किसी भी परिस्थिति में जीवन की नई शुरुआत हो सकती है

मां से छुपाओगे तो कहां जाओगे

महानगरों की बात है, जहां आवास समस्या के चलते किसी लड़के और लड़की द्वारा फ्लैट साझा करने की बात ज्यादा अजीब नहीं समझी जाती। ऐसे में एक मां अपने बेटे से मिलने पहुंची थी, जो फ्लैट में एक लड़की के साथ ‘अलग-अलग’ रहता था। बेटे ने मां की बड़ी आवभगत की। मां ने देखा कि लड़की बड़ी ख़ूबसूरत है और उसके व बेटे के बीच आंखों-आंखों में ही काफ़ी बातें हो रही हैं।
मां क़स्बे से आई थी। उसे पहले से ही शक था। जब बेटे ने मां की निगाहों में संदेह देखा, तो उसने ख़ुद ही सफ़ाई दे दी कि तुम जैसा सोच रही हो, वैसा कुछ भी नहीं है। हम सिर्फ़ रसोई साझा कर रहे हैं, रहते अलग-अलग हैं। ख़ैर, मां ने कुछ नहीं पूछा और वह अगले दिन लौट आई। उसके लौटने के बाद लड़की ने ध्यान दिया कि रसोई में रखा चांदी का जार ग़ायब है। उसने यह बात लड़के से कही।
लड़के ने पहले तो कहा कि मां ऐसा नहीं कर सकतीं। लेकिन चूंकि घर में और कोई नहीं आया था, इसलिए उसने मां को ई-मेल किया- ‘प्रिय मां, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम जार ले गई हो। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि तुम जार नहीं ले गई हो। पर सच यह है कि जार यहां से ग़ायब है।’ कुछ दिनों बाद उसे ई-मेल से ही मां का जवाब मिला- ‘प्रिय बेटे, मैं यह नहीं कह रही हूं कि तुम दोनों एक ही कमरे में रहते हो।
मैं यह भी नहीं कह रही हूं कि तुम लोग अलग-अलग कमरों में रहते हो। पर वास्तविकता यह है कि अगर तुम्हारी दोस्त अपने कमरे में रहती, तो उसे तुरंत पता चल जाता कि जिस जार को तुम लोग ग़ायब समझ रहे हो, वह उसके तकिए के नीचे रखा हुआ है।
’
सबक
मां से कुछ भी नहीं छुपा है। मां से कुछ छुपाना भी नहीं चाहिए। बच्चे की सबसे अच्छी दोस्त मां होती है, इसलिए कोई दुविधा है, तो मां को वह बात बता देनी चाहिए।

पाठशाला

एक छोटा बच्ची दिनभर अपनी गुलेल से निशाने साधता रहता। एक मौक़े पर, जब उसके सारे निशाने चूक गए थे, वह बच्च बड़ा निराश था। गुलेल उसके हाथ में थी और जेब में गोटियां। तभी उसने अपनी दादी की पालतू बत्तख़ देखी और हताशा में उसी पर निशाना साध दिया। इस बार गोटी सीधे बत्तख़ के सिर में लगी और वह वहीं ढेर हो गई। उसके सिर से ख़ून बहता देख बच्चे को समझ में आया कि उसने क्या अनर्थ कर दिया। उसे अफ़सोस हुआ और दादी की नाराÊागी का डर भी लगा। सो आनन-फ़ानन में उसने छोटा गड्ढा खोदा और बत्तख़ को गाड़ दिया। बच्चे ने फौरी राहत की सांस ली कि किसी ने उसे ऐसा करते हुए नहीं देखा। लेकिन नहीं, उसकी छोटी बहन ने सबकुछ देख लिया था। 
थोड़ी देर बाद दादी ने आंगन में कपड़े सुखाने के लिए पोती को याद किया, तो वह हंसते हुए कहने लगी, ‘भैया ने आज से घर के कामों में हाथ बंटाने की कसम खाई है, इसलिए कपड़े वही सुखाएगा। क्यों भैया?’ अगले दिन दादी को रसोई में मदद की Êारूरत पड़ी। बहन ने इस बार भी भाई का नाम आगे कर दिया और सहेलियों के साथ तितलियां पकड़ने निकल गई। अब तो यह रोÊा की बात हो गई। भाई आनाकानी करता, तो वह फुसफुसाकर पूछ लेती, ‘बत्तख़ कहां गई?’ जब ह़फ्ताभर हो गया, तो भाई ने सोचा कि अब तो अति हो गई। 
सो, उसने तमाम परिस्थितियों का हवाला देते हुए दादी को पूरी घटना सुना दी और सिर झुकाकर खड़ा रहा। दादी ने अपने नन्हे पोते का गले से लगा लिया और चूमते हुए बोली, ‘बेटा, मैंने तो यह सब उसी दिन छत पर खड़े-खड़े देख लिया था। लेकिन तुम मेरे प्यारे बच्चे हो, इसलिए तुम्हें माफ़ भी कर दिया। इतने दिनों तक तो मैं यह देख रही थी कि आख़िर तुम कब तक छोटी बहन की ब्लैकमेलिंग सहते हो?’
सबक़ : बात छोटी हो या बड़ी, किसी की भी ब्लैकमेलिंग सहना अपराध की वास्तविक सÊा से भी Êयादा दुखदायी हो सकता है। बेहतर है कि सबको विश्वास में लेते हुए अपनी ग़लती मान ली जाए
50 रु. में बोलने वाला कुत्ता लेंगे?


एक आदमी ने नया-नया कुत्ता ख़रीदा था, लेकिन चार-छह दिनों बाद ही वह कुत्ता लेकर अपने पड़ोसी के पास पहुंच गया और उससे उसे ख़रीदने के लिए चिरौरी करने लगा। उसने कहा, ‘यह बोलने वाला कुत्ता है।’ पड़ोसी को बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ। वह आदमी बोला, ‘और आप इसे सिर्फ़ पचास रुपए में ख़रीद सकते हैं।’ अब तो पड़ोसी को पक्का यक़ीन हो गया कि वह उससे मÊाक़ कर रहा है। उसने कहा, ‘मÊाक़ करने के लिए क्या मैं ही मिला था?
 दुनिया में कोई भी कुत्ता भौंकने के अलावा और कुछ नहीं बोल सकता।’ पड़ोसी का इतना कहना था कि कुत्ते ने आंखों में आंसू भरकर गिड़गिड़ाते हुए बोलना शुरू कर दिया, ‘प्लीÊा, मुझे ख़रीद लीजिए सर! मेरा मालिक तो पूरा कसाई है। यह न तो मुझे ढंग से खाने को देता है, न ही बाहर निकलने देता है। यह मुझे नहलाता-धुलाता तक नहीं है।’ अपने कुत्ते की ये बातें सुनकर उसके मालिक का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने कहा, ‘देखा आपने, इसीलिए मैं इसे बेचना चाहता हूं।’
 मालिक की प्रतिक्रिया से बेपरवाह, कुत्ते ने बोलना जारी रखा, ‘और सर, मेरी यह दुर्गति तब है, जबकि मैं दुनिया का सबसे शानदार कुत्ता हूं। इससे पहले मैं बिल गेट्स और मुकेश अंबानी जैसे मालिकों के साथ उनके बेडरूम में सोता था। मेरी सेवा-चाकरी के लिए दसियों नौकर-चाकर लगे रहते थे। और आज..आज इस आदमी ने मेरी यह दुर्गति कर दी है।’
 बोलते कुत्ते की कहानी से हैरान पड़ोसी उसके मालिक को लताड़ने के अंदाÊा में बोला, ‘सचमुच! यह तो बोलने वाला कुत्ता है। बेचारा। आपने इतने शानदार कुत्ते की यह गत बना दी है!’ पड़ोसी की बात पर मालिक ने अपने पालतू को खा जाने वाली निगाहों से देखा और दांत पीसते हुए बोला, ‘इसी कारण..इसी कारण मैं इस स्साले कुत्ते को पचास रुपए में बेच रहा हूं। मैं इस झुठल्ले की ऐसी ही मनगढ़ंत बातों से तंग आ चुका हूं।’

सबक़ : झूठ बोलने वाले, लंबी-लंबी फेंकने वाले की क़ीमत दो कौड़ी की भी नहीं रह जाती, चाहे कुत्ता हो या इंसान। व्यक्ति के झूठ के कारण उसकी अच्छे से अच्छी प्रतिभा पर भी पानी फिर जाता है
बेटियां और बूढ़े पिता का द्वंद्व...

एक बूढ़ा व्यक्ति था, वो किसान था। उसकी दो बेटियां थीं। उनमें से एक का विवाह एक कुम्हार से हुआ और दूसरी का एक किसान के साथ। एक बार पिता अपनी दोनों पुत्रियों से मिलने गया। पहली बेटी से हालचाल पूछा, तो उसने कहा कि इस बार हमने बहुत परिश्रम किया है और बहुत सामान बनाया है।
बस यदि वर्षा न आए, तो हमारा कारोबार खूब चलेगा। बेटी ने पिता से आग्रह किया कि वो भी प्रार्थना करे कि बारिश न हो। फिर पिता दूसरी बेटी से मिला, जिसका पति किसान था। उससे हालचाल पूछा, तो उसने कहा कि इस बार बहुत परिश्रम किया है और बहुत फसल उगाई है, परन्तु वर्षा नहीं हुई है।
यदि अच्छी बरसात हो जाए, तो खूब फसल होगी। उसने पिता से आग्रह किया कि वो प्रार्थना करे कि खूब बारिश हो। इससे किसान पसोपेश में पड़ गया। उसके लिए यह दुविधा की स्थिति थी, क्योंकि एक बेटी का आग्रह था कि पिता वर्षा न होने की प्रार्थना करे और दूसरी बेटी का इसके विपरीत आग्रह था कि बरसात हो।
पिता बड़ी उलझन में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। स्थिति ही ऐसी थी कि एक के लिए प्रार्थना करे, तो दूसरी का नुक़सान। पिता परेशान हो उठा कि आखिर इस मामले का समाधान क्या हो कि दोनों बेटियों का नुक़सान न हो। उसने बहुत सोचा, तो उसे एक तरकीब सूझी।

और इसके बाद वह अपनी बेटियों से मिला। उसने बड़ी बेटी को समझापर लाभ का आधा हिस्सा बड़ी बहन को देने राजी किया। इस तरह उसने अपने द्वंद्व या कि यदि इस बार वर्षा नहीं हुई, तो तुम अपने लाभ का आधा हिस्सा अपनी छोटी बहन को देना। इसके बाद, छोटी बेटी से मिलकर उसको भी वर्षा होने 
से विजय पाई
ईश्वर ने परम सत्य कहां छुपाया


एक बार ईश्वर ने सभी प्राणियों को बुलाया, लेकिन मानव को जान-बूझकर छोड़ दिया। दरअसल, वह इंसान से कुछ छुपाना चाहता था। ईश्वर चाहता था कि ‘परमसत्य’ इंसान की पहुंच में न आए।
 इसके लिए उसने सभी प्राणियों से सुझाव मांगे कि आख़िर परमसत्य को कहां छुपाया जाए, जहां तक मानव पहुंच ही न पाए। सभी ने सोचना शुरू किया। सबसे पहले चील बोली, ‘प्रभु, उसे मुझे दे दीजिए, मैं उसे चांद पर गड़ा आऊंगी।’ ईश्वर मनुष्य की क्षमता जानता था, इसलिए उसने तुरंत कहा, ‘नहीं-नहीं, चांद पर पहुंचना बहुत मुश्किल नहीं है। एक न एक दिन इंसान वहां पहुंच ही जाएगा।’ फिर एक मछली बोली कि मैं उसे सागर की अतल गहराइयों में ले जाकर दबा देती हूं। ईश्वर ने फिर प्रतिवाद किया कि सागर भी मनुष्य की पहुंच से दूर नहीं है। किसी न किसी दिन वह उसकी गहराई को भी नाप ही लेगा।
 अबकी बार एक छछूंदर ने सुझाव दिया, ‘मैं उस परमसत्य को धरती के गर्भ में गड़ा देता हूं।’ इस बार भी ईश्वर का वही जवाब था कि वह जगह भी इंसान की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं रहेगी। समस्या विकट थी। सभी प्राणी अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से सुझाव दे रहे थे, लेकिन ईश्वर मानव की क्षमताओं से अनजान नहीं था। वह जानता था कि मानव एक न एक दिन संसार के हर कोने को छू लेगा और उससे कुछ भी छुपा न रह जाएगा।
 एक बूढ़ा कछुआ सबकी बातें सुन रहा था। जब सब ने हथियार डाल दिए, तो उसने अपनी महीन आवाÊा में कहा, ‘मेरे ख्याल से उसे इंसान के दिल के भीतर छुपा देना चाहिए। वह वहां कभी नहीं झांकेगा।’ और ईश्वर ने ऐसा ही किया।

Tuesday, August 24, 2010

कथा संसार

रिश्तें 
राखी सिर पर थी और भाई बैचेन की दीदी को  राखी पर कम से कम पांच सो सात सो साडी तो देनी पड़ेगी ऊपर से दीदी के यहाँ आने जाने का खर्चा और किराया  अलग से  
उसे याद था की बचपन में दीदी की गिफ्ट के लिए वह अपनी गुल्लक न्योछावर करने को तैयार रहता था मगर अब वह जब कमाने लगा हे कमरतोड़ महंगाई ने कमजोर  कर दिया हे उसे सो उसने दीदी को फ़ोन पर कहा - सारी दीदी इस बार राखी पर शायद नहीं आ पाउगा 
दीदी भी अपने भाई का स्वभाव और उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति जानती थी सो बड़े मन से बोली कोई बात नहीं भाई में राखी पोस्ट कर देती हू  मगर इस बार तुझसे  डबल गिफ्ट चाहिए साडी तो तू हमेशा देता हे पर इस बार  मुझे साडी वाड़ी नहीं बल्कि तेरे यहाँ की गजक पट्टी और रेबडी नमकीन दोनों चाहिए और तुझे कसम हे यदि तुने पाव पाव से ज्यादा भेजी तो क्योकि ये दोनों न तो तेरे  जीजाजी को ज्यादा भाती हे और न बच्चे ज्यादा खाते हैं और में अकेली भला कितना खा सकती हु सुना हैं रघु मामा किसी काम से आने वाले हे तो उनके हाथ मेरा गिफ्ट भेजना मत भूलना 
फ़ोन पर बातचीत ख़त्म होने के बाद दोनो  आंसू पोछ रहे थे   

Friday, August 20, 2010

नयी कहानी

प्रतिमाएँ
उनका काफिला जैसे ही बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के नज़दीक पहुँचा, भीड़ ने घेर लिया। उन नग-धड़ंग अस्थिपंजर-से लोगों के चेहरे गुस्से से तमतमा रहे थे। भीड़ का नेत्तृव कर रहा युवक मुट्ठियाँ हवा में लहराते हुए चीख रहा था, “मुख्यमंत्री---मुर्दाबाद ! रोटी कपड़ा दे न सके जो, वो सरकार निकम्मी है! प्रधानमंत्री !---हाय!हाय!1” मुख्यमंत्री ने जलती हुई नजरों से वहां के जिलाधिकारी की ओर देखा। आनन-फानन में प्रधानमंत्री जी के बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के हवाई निरीक्षण के लिए हेलीकाप्टर का प्रबंध कर दिया गया। वहां की स्थिति सँभालने के लिए मुख्यमंत्री वहीं रुक गए।
हवाई निरीक्षण से लौटने पर प्रधानमंत्री दंग रह गए। अब वहां असीम शांति छायी हुई थी। भीड़ का नेतृत्व कर रहे युवक की विशाल प्रतिमा चौराहे के बीचोंबीच लगा दी गई थी। प्रतिमा की आँखें बंद थी, होंठ भिंचे हुए थे और कान असामान्य रूप से छोटे थे। अपनी मूर्ति के नीचे वह युवक लगभग उसी मुद्रा में हाथ बाँधे खड़ा था। नंग-धड़ंग लोगों की भीड़ उस प्रतिमा के पीछे एक कतार के रूप में इस तरह खड़ी थी मानो अपनी बारी की प्रतीक्षा में हो। उनके रुग्ण चेहरे पर अभी भी असमंजस के भाव थे।
मुख्यमंत्री सोच में पड़ गए थे। जब से उन्होंने इस प्रदेश की धरती पर कदम रखा था, जगह-जगह स्थानीय नेताओं की आदमकद प्रतिमाएँ देखकर हैरान थे। सभी प्रतिमाओं की स्थापना एवं अनावरण मुख्यमंत्री के कर कमलों से किए गए होने की बात मोटे-मोटे अक्षरों में शिलालेखों पर खुदी हुई थी। तब वे लाख माथापच्ची के बावजूद इन प्रतिमाओं को स्थापित करने के पीछे का मकसद एकदम स्पष्ट हो गया था। राजधानी लौटते हुए प्रधानमंत्री बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे।
दो घंटे बाद ही मुख्यमंत्री को देश की राजधानी से सूचित किया गया-“आपको जानकर हर्ष होगा कि पार्टी ने देश के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशाल प्रदेश की राजधानी में आपकी भव्य,विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया है। प्रतिमा का अनावरण पार्टी-अध्यक्ष एवं देश के प्रधानमंत्री के कर-कमलों से किया जाएगा। बधाई !”


घंटियाँ
“कुछ भी कहो, गलत तरीकों से इकट्ठा किया गया रुपया फलता नहीं हैं।” महेन्द्र ने अपना मग बियर से भरते हुए कहा।
“बेकार की बात है,” रतन ने कहा, “आज ऐसे लोग ही फल-फूल रहे हैं।”
“मैं साबित कर सकता हूँ। जिला अस्पताल वालें। डाक्टर चंद्रा को ही ले लो। उसने गरीब मरीजों के लिए अस्पताल में आई दवाएँ बाज़ार में बेच-बेचकर खूब रुपया बटोरा था और पागलखाने में एड़िया रगड़ रहा है।”
“यह संयोग भी हो सकता है।” रतन चिढ़कर बोला।
“नरेश के बिजनेस पार्टनर नागराजन को तो भूले नहीं होंगे। उसने जिस तरह नरेश को धोखा देकर अपनी प्रोपर्टी बनाई, वो किसी से छिपा नहीं है। आज अपने दोनों बेटों से हाथ धो बैठा है।”
महेन्र्द बोलता जा रहा था, पर रतन की आँखों के आगे भारत-पाकिस्तान बँटवारे का वह दिन घूमने लगा था,जब दंगों के कारण दुमेल से भागते हुए अपने पड़ोसी पंडित रामनाथ को उनके कमरे में बंद कर दिया और उनके मंदिर में लगी सोने की घंटियाँ चुराकर हिंदुस्तान भाग आया था। कमरा बंद होने के कारण रामनाथ भाग नहीं पाया था और दंगाइयों ने उसे मौत के घाट उतार दिया था। आज उसकी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के पीछे पंडित के मंदिर से चुराए गए सोने का बहुत योगदान था।
“मैंने तो गलत तरीकों से धन बटोरने वालों को तबाह होते ही देखा है।” महेन्द्र ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा।
इतनी देर में रतन बियर के तीन मग और हलक से नीचे उतार चुका था। उसे लगा, आज महेन्द्र जानबूझकर उससे इस तरह की बातें कर रहा है।
“बकवास बंद करो।” एकाएक वह चिल्ला पड़ा।
महेन्द्र ने हैरानी से अपने दोस्त की ओर देखा।
“लगता है---ज्यादा हो गई , चलो भीतर चलकर खाना खाते हैं।” महेन्द्र कुर्सी से उठा तो उसके कोट की आस्तीनों पर लगे पीतल के बटन खनखनाए ।
रतन को लगा, महेन्द्र घंटी बजाकर उसे चिढ़ा रहा है।
“हरामजादे, घंटी बजाता है।” वह चीखा, उसने पूरी ताकत से एक घूँसा अपने दोस्त के जबड़े पर जड़ दिया। इसी झोंक में वह अपना संतुलन भी खो बैठा और मेज, उस पर रखे काँच के सामान समेत वहीं ढेर हो गया---पर घंटियाँ अभी उसके कानों में बज रहीं थीं।“
खरबूजा
बड़े साहब आफिस से घर लौटे तो काफी थके हुए लग रहे थे। चपरासी ने उनके सूटकेस के साथ-साथ एक पुराना टू इन वन और प्रेशर कुकर भी भीतर रखा तो मेम साहब चौंक पड़ीं।
“ये सब किसका है?” उन्होंने साहब से पूछा ।
“वही---चीफ साहब,” वे चिढ़कर बोले, “मीटिंग के बाद चलने लगा तो बोले-हमारा टू इन वन और प्रेशर कुकर कई दिनों से खराब पड़ा है, तुम्हारे शहर में अच्छी दुकानें हैं, रिपेयर कराकर भेज देना।”
“अपना टेप रिकार्डर भी महीनों से खराब पड़ा है, उसे भी साथ भेजना न भूलिएगा,” मेम साहब ने कहा,---“हाँ, याद आया, राम खिलावन पर सख्ती कीजिए---चोरी करने लगा है।”
“मैं आज विरमानी स्टोर्स गई थी, मैंने बातों ही बातों में उससे कहा कि मिक्सी की मरम्मत के बहुत पैसे ले लिये। तब उसने मुझे बताया कि राम खिलावन ने ही वाउचर में कुछ रुपए बढ़वाए थे।”
“राम खिलावन!” बड़े साहब ने सख्त आवाज़ में कहा, “कब से कर रहे हो चोरी?”
“मैं कुछ समझा नहीं, हुजूर!” वह बिना घबड़ाए बोला।
“विरमानी कह रहा था, तुमने उस ट्यूब लाइट वाले वाउचर में कुछ रुपए बढ़वाए थे?”
“अच्छा, वो” राम खिलावन ने कहा, “आपने उस दिन शाम को मिक्सी रिपेयर करवाने को दी थी, स्टोर बद हो चुका था इसलिए मैं मिक्सी घर ले गया था। हुजूर! मेरी घरवाली थोड़ी तेज है, पूछने लगी-यह क्या है,किसका है। मुझे ‘सबकुछ’ बताना पड़ा। बस, फिर क्या था, पीछे पड़ गई । कहने लगी-साहब लोग द्फ्तर के खर्चे से न जाने क्या-क्या घर ले जाते हैं, मुझे भी एक सिलबट्टा चाहिए। हुजूर आपकी मिक्सी रिपेयर के वाउचर में उसी सिलबट्टे के लिए कुछ रुपए बढ़वाए थे।” राम खिलावन ने रुककर बारी-बारी से साहब और मेम साहब की ओर देखा, फिर ढिठाई से बोला, “इसे चोरी तो नहीं कहेंगे, साहब!”
“तू बहुत बातें बनाने लगा है। चल जा---काम कर्।” इस बार बड़े साहब की आवाज़ खोखली थी
संस्कार

उसे लगा, पिताजी अपनी भीगी आँखों से एकटक उसी की ओर देख रहे हैं। उसने सूखे तौलिए से उनकी रुग्ण,कृशकाया को धीरे-धीरे पोंछा और फिर पत्नी को आवाज दी, “सुनीता ज़रा पाउडर का डिब्बा तो देना!” फिल्मी पत्रिका पढ़ने में तल्लीन पत्नी ने उसकी आवाज़ सुनकर बुरा-सा मुँह बनाया और फिर पाउडर का डिब्बा लेकर बेमन से उसके पास आ गई। तभी पलंग के पास पड़े मल के पाट और बलगम भरी चिलमची पर नज़र पढ़ते ही उसने जल्दी से साड़ी का पल्लू नाक पर रख लिया। उसने चिढ़े हुए अंदाज में पति को घूरा और पैर पटकते हुए लौट गई।
“
बेटा,” पिता ने काँपती आवाज़ में कहा, “तुम थक गए होगे। जाओ, आराम करो। मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इस शरीर से जल्द से जल्द मुक्त कर दे।” तभी नन्हा राजू अपने पिता के पास आया, पलंग के पास पड़ी बलगम भरी चिलमची उठाकर बोला, “मैं इछको बाथलूम में लख आऊँ?” वह अपने बेटे को देखता रह गया। पत्नी भी राजू की ओर देखने लगी थी।
“
जाओ---रख आओ।” उसकी आवाज़ भर्रा गई ।
“
भगवान तुझ जैसा बेटा सबको दे।” वृद्घ की डबडबाई आँखें छलक पड़ी थीं, “तुझे मेरा मल-मूत्र साफ करना पड़ता है---मुझे अच्छा नहीं लगता। अपने साथ तुझे भी नरक में रगड़ रहा हूँ।”
“
पिताजी, आप ऐसा क्यों सोचते हैं? यह मेरा कर्त्तव्य है। वैसे भी आजकल के हालात को देखते हुए---” रुककर उसने एक निगाह अपनी पत्नी और बाथरुम से लौटते हुए बेटे पर डाली, “मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ---सिर्फ अपने लिए कर रहा हूँ।”
“
बेटा! तुझसे जीतना मुश्किल है--- मुझे ज़रा बिठा दे।” उसने पिता को उठाकर बैठा दिया। उसने एक हाथ से उनकी पीठ को सहारा देते हुए दूसरा हाथ गाव तकिए के लिए बढ़ाया ही था कि पत्नी लपककर उसके पास आई और उसने फुर्ती से तकिया अपने ससुर की पीठ के पीछे लगा दिया ।